किशोरों के सच्चे रिश्तों को बचाने के लिए पॉक्सो में ‘रोमियो-जूलियट’ खंड शामिल करे केंद्र: न्यायालय
नेत्रपाल अविनाश
- 09 Jan 2026, 10:15 PM
- Updated: 10:15 PM
नयी दिल्ली, नौ जनवरी (भाषा) यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के व्यापक दुरुपयोग को देखते हुए, उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को केंद्र से इस खतरे को रोकने के लिए ‘‘रोमियो-जूलियट’’ खंड शामिल करने का निर्देश दिया, ताकि ‘‘वास्तविक किशोर संबंधों’’ को इसके कठोर प्रावधानों से छूट दी जा सके।
शीर्ष अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह भी कहा कि उच्च न्यायालय पॉक्सो अधिनियम के तहत मामलों में जमानत के चरण में पीड़ितों की अनिवार्य चिकित्सा आयु निर्धारण का आदेश नहीं दे सकते।
न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा, “चूंकि इन कानूनों के दुरुपयोग का बार-बार न्यायिक संज्ञान लिया गया है, इसलिए इस फैसले की एक प्रति भारत सरकार के विधि सचिव को भेजी जाए।’’
पीठ ने इस कानून को ‘‘आज के बच्चों और कल के नेताओं की रक्षा करने के उद्देश्य से न्याय की सबसे गंभीर अभिव्यक्ति’’ करार दिया।
इस संबंध में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक आदेश को रद्द करते हुए शीर्ष अदालत ने माना कि जमानत के चरण में पीड़ितों की चिकित्सकीय आयु निर्धारण के संबंध में उच्च न्यायालय का निर्देश दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 439 (जमानत प्रदान करना) के तहत अधिकार क्षेत्र से बाहर था।
यह मामला उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने से जुड़ा है जिसमें एक नाबालिग लड़की से जुड़े यौन उत्पीड़न मामले में आरोपी को जमानत दी गई थी।
जमानत देते समय, उच्च न्यायालय ने कई निर्देश जारी किए, जिनमें यह भी शामिल था कि पॉक्सो अधिनियम के तहत प्रत्येक मामले में, पुलिस को शुरुआत में ही चिकित्सा आयु-निर्धारण परीक्षण करना होगा।
उच्च न्यायालय के फैसले को रद्द करते हुए शीर्ष अदालत ने जमानत देने वाले आदेश के हिस्से को ‘‘अपरिवर्तित’’ रखा।
न्यायमूर्ति करोल द्वारा लिखित फैसले में यह सवाल सामने आया कि क्या उच्च न्यायालय, जमानत याचिकाओं पर सुनवाई करते समय, पॉक्सो अधिनियम से जुड़े सभी मामलों में आयु-निर्धारण परीक्षण आयोजित करने को अनिवार्य करने का निर्देश जारी कर सकता है।
फैसले में कहा गया, ‘‘इसमें कोई शक नहीं कि उच्च न्यायालय एक संवैधानिक न्यायालय है। हालांकि, इस मामले में उच्च न्यायालय द्वारा क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटि वैधानिक शक्ति के प्रयोग में हुई थी, न कि संविधान के तहत...।’’
निर्णयों का हवाला देते हुए, यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि पीड़ित की उम्र का निर्धारण मुकदमे का विषय है, न कि जमानत के चरण में।
न्यायालय ने कहा, ‘‘यदि आयु पर संदेह हो, तो जमानत न्यायालय आयु सिद्ध करने के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों की जांच कर सकता है, लेकिन वह उन दस्तावेजों के सही या गलत होने के प्रश्न में हस्तक्षेप नहीं करेगा।’’
पीठ ने रजिस्ट्रार (न्यायिक) को निर्देश दिया कि वह आवश्यक अनुवर्ती कार्रवाई के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल के साथ फैसले की प्रति साझा करें, साथ ही निचली अदालतों को भी जानकारी दें।
इसने वकीलों की नैतिक जिम्मेदारी पर भी जोर दिया और कहा कि वे तुच्छ या प्रतिशोधात्मक मुकदमों के खिलाफ एक प्रहरी के रूप में कार्य करें, अन्यथा अनियंत्रित दुरुपयोग न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को कमजोर करेगा।
भाषा नेत्रपाल