अदालत ने 640 करोड़ रु की साइबर ठगी के ईडी मामले में दो सीए को नहीं दी अग्रिम जमानत
नरेश
- 02 Feb 2026, 08:34 PM
- Updated: 08:34 PM
नयी दिल्ली, दो फरवरी (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को 640 करोड़ रुपये के साइबर ठगी मामले से जुड़ी धनशोधन जांच में दो चार्टर्ड अकाउंटेंट को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया।
न्यायमूर्ति गिरीश कठपालिया ने भास्कर यादव और अशोक कुमार शर्मा की अग्रिम जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।
न्यायमूर्ति कठपालिया ने 22 पन्नों के अपने आदेश में कहा कि धनशोधन का एक जटिल जाल था, ऐसे में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा हिरासत में लिए गए दोनों आरोपियों से पूछताछ करने के लिए व्यक्त की गई आवश्यकता अकारण नहीं थी।
उच्च न्यायालय ने कहा, '' कुशल पेशेवर होने के नाते आरोपी/आवेदक कथित तौर पर अपराध की काली कमाई को कई स्तरों पर सफेद बनाने में सफल रहे हैं। इसे उजागर करने के लिए, प्रवर्तन निदेशालय के विद्वान वकील ने जो यह मांग रखी है कि हिरासत में पूछताछ अत्यंत आवश्यक है, उसमें मुझे दम नजर आता है।''
उच्च न्यायालय ने कहा, ''यह महज क्रिप्टोकरेंसी में लेन-देन का मामला नहीं है, जो अपने आप में इस देश में अपराध नहीं है। आरोपियों की जिम्मेदारी सिर्फ क्रिप्टोकरेंसी लेनदेन पर कर चुकाने तक सीमित है। लेकिन ये मामले भोले-भाले निवेशकों की जेब से धोखाधड़ी से निकाले गए पैसों के व्यापक और जटिल जाल को उजागर करते हैं । ये निवेशक मुख्य रूप से मध्यम वर्ग से संबंधित प्रतीत होते हैं।''
अदालत ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था के व्यापक हित में सार्थक पूछताछ और जांच करने की आवश्यकता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
ईडी ने पहले एक बयान में कहा था कि उसकी यह धनशोधन जांच दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) द्वारा दर्ज की गई दो प्राथमिकियों पर आधारित है। उसने कहा था कि ये प्राथमिकियां सट्टेबाजी, जुआ, अंशकालिक नौकरियों और फिशिंग (ठगी का एक प्रकार) घोटालों के माध्यम से जुटाये गये 640 करोड़ रुपये के सिलसिले में साइबर धोखाधड़ी के आरोपों की जांच के लिए दर्ज की गई थीं।
ईडी के अनुसार, भोले-भाले लोगों को ठगकर प्राप्त की गयी धनराशि को इंडियन बैंक के 5,000 से अधिक 'म्यूल' खातों के माध्यम से इधर से उधर किया गया तथा बाद में उसे संयुक्त अरब अमीरात के भुगतान मंच 'पीवाईवाईपीएल' पर डाल दिया गया।
'म्यूल खाते' ऐसे अनजाने लोगों के खाते होते हैं जिनका इस्तेमाल साइबर ठग ठगी की रकम को रखने/अंतरित करने के लिए करते हैं।
जांच एजेंसी के मुताबिक, 'साइबर ठगी' से प्राप्त रकम का कुछ हिस्सा विभिन्न भारतीय बैंकों द्वारा जारी डेबिट और क्रेडिट कार्डों के माध्यम से दुबई में नकद निकाला गया था।
जांच एजेंसी के अनुसार, यह कथित घोटाला कुछ चार्टर्ड अकाउंटेंट, कंपनी सेक्रेटरी और क्रिप्टो व्यापारियों के एक "गठबंधन" के माध्यम से चलाया जा रहा था, जो अपराध की आय को वैध बनाने के लिए मिलकर काम करते थे।
भाषा राजकुमार नरेश
नरेश
0202 2034 दिल्ली