स्वास्थ्य मंत्रालय ने ‘पैसिव यूथेंसिया’ पर नया मसौदा दिशानिर्देश जारी किया
सुभाष पवनेश
- 28 Sep 2024, 08:42 PM
- Updated: 08:42 PM
नयी दिल्ली, 28 सितंबर (भाषा) केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मसौदा दिशानिर्देशों के अनुसार, चिकित्सकों को असाध्य रोग से पीड़ित मरीजों से जीवन रक्षक प्रणाली हटाने पर कुछ खास शर्तों के आधार पर ‘‘सोच-समझकर निर्णय’’ लेना चाहिए, जिसमें मरीज या उनके परिजनों द्वारा लिखित रूप में किया गया इनकार भी शामिल है।
दिशानिर्देशों में, ‘पैसिव यूथेंसिया’ (जीवन रक्षक उपाय बंद कर मरीज को मरने देने) के लिए चार शर्तें निर्धारित की गई हैं, जिसके अंतर्गत ‘‘रोगी के सर्वोत्तम हित में विचार कर निर्णय लिया जा सकता है, ताकि किसी असाध्य रोग की स्थिति में ऐसे जीवन रक्षक उपाय को रोका या बंद किया जा सके, जिससे रोगी को कोई लाभ होने की संभावना नहीं है या जिससे उसे पीड़ा होने और गरिमा को ठेस पहुंचने की संभावना नहीं है।’’
ये शर्तें इस प्रकार हैं -- क्या व्यक्ति को ‘ब्रेनस्टेम डेथ’ घोषित किया गया है, क्या चिकित्सकीय पूर्वानुमान और सुविचारित राय है कि रोगी के रोग की स्थिति गंभीर है और चिकित्सकीय हस्तक्षेप से लाभ होने की संभावना नहीं है, रोगी/परिजन द्वारा लिखित रूप से किया गया इनकार, पूर्वानुमान संबंधी जागरूकता के बाद, जीवन रक्षक उपाय जारी रखने और उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का अनुपालन।
‘ब्रेनस्टेम डेथ’ वह स्थिति है जब ब्रेनस्टेम (मस्तिष्क का एक हिस्सा) काम करना बंद कर देता है। ऐसा होने पर व्यक्ति कभी भी होश में नहीं आ पाएगा या वेंटिलेटर के बिना सांस नहीं ले पाएगा।
‘असाध्य रूप से बीमार मरीजों से जीवन रक्षक प्रणाली हटाने के लिए मसौदा दिशानिर्देश’ में यह भी कहा गया है कि चिकित्सकों को असाध्य रूप से बीमार मरीजों में जीवन रक्षक उपाय शुरू न करने का निर्णय सोच-समझकर लेना चाहिए।
ऐसे मामले में, तीन स्थितियों को ध्यान में रखना होगा - क्या व्यक्ति को ‘ब्रेनस्टेम डेथ’ घोषित किया गया है, क्या चिकित्सा पूर्वानुमान और विचारित राय है कि रोगी की बीमारी की स्थिति गंभीर है और चिकित्सकीय हस्तक्षेप से लाभ होने की संभावना नहीं है, रोगी/परिजन द्वारा लिखित में किया गया इनकार, पूर्वानुमान की जानकारी - को ध्यान में रखना होगा।
केंद्रीय मंत्रालय ने मसौदे पर हितधारकों से 20 अक्टूबर तक प्रतिक्रिया और सुझाव मांगे हैं।
मसौदा दिशानिर्देश पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. आर.वी. अशोकन ने कहा कि यह चिकित्सकों को कानूनी जांच के दायरे में लाता है और उनमें तनाव पैदा करता है।
डॉ. अशोकन ने कहा, ‘‘इस तरह के नैदानिक निर्णय हमेशा चिकित्सकों द्वारा सहमति से लिए जाते हैं। मरीज के रिश्तेदारों को समझाया जाता है और सारी जानकारी दी जाती है, किसी भी मामले में उन्हें विश्वास में लिया जाता है और हर मामले में नफा-नुकसान के आधार पर निर्णय लिया जाता है। इसे दिशानिर्देशों के रूप में प्रस्तुत करना और यह आरोप लगाना कि अनुचित निर्णय लिए गए हैं या उन्हें विलंबित किया गया है, स्थिति को गलत तरीके से समझना है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘सबसे पहले यह धारणा और पूर्वधारणा कि अनावश्यक रूप से उपकरणों का उपयोग किया जाता है, गलत है। यह चिकित्सकों को कानूनी जांच के दायरे में लाता है।
डॉ. अशोकन ने कहा, ‘‘इससे भी अधिक, डॉक्टर-रोगी संबंध में जो कुछ बचा है... उसे दस्तावेजों में परिभाषित करने की कोशिश करना, जिसकी कानूनी रूप से जांच किया जाना चिकित्सकों को अधिक तनाव में डालने के अलावा कुछ नहीं है।’’
उन्होंने कहा कि कुछ चीजें ऐसी हैं जिन्हें विज्ञान और परिस्थिति के आधार पर रिश्तेदारों, मरीजों और चिकित्सकों पर छोड़ देना चाहिए।
डॉ. अशोकन ने कहा कि आईएमए इस दस्तावेज का अध्ययन करेगा और मसौदा दिशानिर्देशों में संशोधन की मांग करते हुए अपने सुझाव देगा।
मसौदा दिशानिर्देशों में घातक बीमारी को ऐसी लाइलाज स्थिति के रूप में परिभाषित किया गया है, जिससे निकट भविष्य में मृत्यु अवश्यंभावी हो। मस्तिष्क को गंभीर आघात, जो 72 घंटे या उससे अधिक समय के बाद भी ठीक नहीं होती, उसे भी इसमें शामिल किया गया है।
मसौदा दस्तावेज में कहा गया है, ‘‘एक्टिव यूथेंसिया, मरणासन्न अवस्था में किसी रोगी के स्वैच्छिक अनुरोध पर, उसके हित में डॉक्टर के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप द्वारा इरादतन उसके जीवन को खत्म करना है। भारत में यह अवैध है।’’
भाषा
सुभाष