गरीबों की प्रजनन क्षमता पर पड़ रहा सबसे अधिक असर: आईवीएफ विशेषज्ञ
जोहेब नरेश
- 22 Sep 2024, 05:55 PM
- Updated: 05:55 PM
(पायल बनर्जी)
नयी दिल्ली, 22 सितंबर (भाषा) बांझपन सिर्फ एक स्वास्थ्य समस्या नहीं है, बल्कि जीवनशैली से उत्पन्न एक संकट है और इसकी दर विशेष रूप से निम्न आय वर्ग तथा दूसरी व तीसरी श्रेणी के शहरों में बढ़ रही है, जहां स्वास्थ्य सेवाएं सीमित हैं। एक शीर्ष आईवीएफ विशेषज्ञ ने यह बात कही।
भारत में प्रजनन से संबंधित संस्थानों के सबसे बड़े समूह इंदिरा आईवीएफ के संस्थापक व अध्यक्ष डॉ. अजय मुर्डिया ने कहा कि इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) जैसी सहायक प्रजनन तकनीकों में प्रगति से आशाएं जगती हैं, लेकिन यह एक वास्तविकता है कि इससे संवेदनशील वर्ग को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
उन्होंने कहा, “बांझपन अब केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं रह गई है; यह जीवनशैली से जुड़ी चुनौतियों के कारण उत्पन्न संकट है, जिसका सबसे अधिक असर वंचित वर्ग पर पड़ता है। आईवीएफ जैसी उन्नत सुविधाएं भी कई लोगों की पहुंच से बाहर रहेंगी।”
संवेदनशील समुदायों में जीवनशैली से जुड़े कारकों जैसे मोटापा, खराब आहार, धूम्रपान और दीर्घकालिक तनाव संसाधनों व जागरूकता की कमी के कारण अक्सर बढ़ जाते हैं, जो बांझपन के लिए महत्वपूर्ण कारण माने जा रहे हैं।
डॉ. मुर्डिया ने कहा कि ये मुद्दे व्यक्तिगत स्वास्थ्य से कहीं आगे जाते हैं; ये गर्भधारण में बाधाएं पैदा करते हैं, जिनका उन लोगों पर अधिक प्रभाव पड़ता है जिनके पास कम साधन हैं।
उन्होंने कहा, “आर्थिक रूप से संवेदनशील वर्गों में जीवनशैली संबंधी विकल्प गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा तक सीमित पहुंच के कारण प्रजनन संकट का एक मुख्य कारक बन रहे हैं। जिन आदतों को हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, खासकर कम समृद्ध क्षेत्रों में, वे अब गर्भधारण करने की क्षमता को प्रभावित कर रही हैं।”
इस संकट का दायरा तब स्पष्ट हो जाता है जब मोटापे और प्रजनन क्षमता पर इसके प्रभाव से संबंधित चौंकाने वाले आंकड़ों की समीक्षा की जाती है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में आठ में से एक व्यक्ति मोटापे से ग्रस्त है। यह एक ऐसी समस्या है जिससे बांझपन का जोखिम नाटकीय रूप से बढ़ जाता है।
मोटापे से ग्रस्त महिलाओं में स्वास्थ्य के लिहाज से उचित वजन बनाए रखने वाली महिलाओं की तुलना में बांझपन से जूझने की संभावना तीन गुना अधिक होती है, जबकि पुरुषों के लिए, उनके आदर्श वजन से अतिरिक्त 9 किलोग्राम वजन बढ़ने पर बांझपन का खतरा 10 प्रतिशत बढ़ जाता है।
उन्होंने कहा कि ये प्रवृत्तियां अक्सर कम समृद्ध क्षेत्रों में और अधिक बढ़ जाती हैं, जहां स्वास्थ्य देखभाल सहायता और जीवनशैली से जुड़े संस्थान बहुत कम हैं।
डॉ. मुर्डिया ने बताया कि धूम्रपान/तम्बाकू चबाना जीवनशैली का एक और हिस्सा है, जिसका प्रजनन स्वास्थ्य पर बड़ा प्रभाव पड़ता है।
उन्होंने कहा कि अध्ययनों से पता चलता है कि धूम्रपान करने वाली महिलाओं में धूम्रपान न करने वालों की तुलना में एक वर्ष में देरी से गर्भधारण की संभावना 54 प्रतिशत अधिक होती है, तथा जो पुरुष प्रतिदिन 20 से अधिक सिगरेट पीते हैं, उनके शुक्राणुओं की सांद्रता में 19 प्रतिशत की गिरावट आती है।
उन्होंने कहा कि इससे न केवल प्राकृतिक गर्भाधान की संभावना कम हो जाती है, बल्कि आईवीएफ जैसी सहायक प्रजनन तकनीकें भी जटिल हो जाती हैं।
‘अमेरिकन सोसायटी फॉर रिप्रोडक्टिव मेडिसिन’ और ‘नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन’ द्वारा प्रकाशित इन निष्कर्षों में प्रजनन क्षमता पर धूम्रपान के गंभीर प्रभावों का जिक्र है तथा इस समस्या से निपटने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीतियों की आवश्यकता पर बल दिया गया है।
डॉ. मुर्डिया ने कहा, “द्वितीय और तृतीय श्रेणी के शहरों में देर से विवाह और परिवार नियोजन में देरी से प्रजनन संकट बढ़ता है। हालांकि तकनीक इसमें मदद करती है, लेकिन उम्र के साथ प्रजनन क्षमता में प्राकृतिक गिरावट से ऐसी चुनौतियां पैदा होती हैं, जिनके लिए कई लोग तैयार नहीं होते।”
भाषा जोहेब