मप्र: भोजशाला सरस्वती मंदिर घोषित, उच्च न्यायालय ने परिसर में नमाज अदा करने का आदेश रद्द किया
जितेंद्र
- 15 May 2026, 06:10 PM
- Updated: 06:10 PM
इंदौर, 15 मई (भाषा) मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने धार के भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर के ऐतिहासिक विवाद के मामले में शुक्रवार को फैसला सुनाते हुए इस मध्यकालीन स्मारक की धार्मिक प्रकृति हिंदू मान्यताओं में 'ज्ञान की देवी' के रूप में पूजी जाने वाली वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर के तौर पर तय की।
अदालत ने रेखांकित किया कि परमार वंश के राजा भोज की विरासत से जुड़े इस स्थल पर हिंदुओं की पूजा-अर्चना की निरंतरता कभी समाप्त नहीं हुई है।
उच्च न्यायालय ने विवादित परिसर में केवल हिंदुओं को उपासना का अधिकार दिए जाने की गुहार स्वीकार की और इसके साथ ही भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के सात अप्रैल 2003 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें मुस्लिमों को हर शुक्रवार स्मारक में नमाज अदा करने की इजाजत दी गई थी।
उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी ने इस मामले से संबंधित पांच याचिकाओं और एक रिट अपील पर पुरातात्विक व ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई की अधिसूचनाओं व उसके वैज्ञानिक सर्वेक्षण और कानूनी प्रावधानों की रोशनी में फैसला सुनाया।
उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के मुकदमे में शीर्ष अदालत के फैसले में निर्धारित सिद्धांतों का भी उल्लेख किया।
खंडपीठ ने सामाजिक संगठन 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' और कुलदीप तिवारी व अन्य लोगों की दायर दो अलग-अलग जनहित याचिकाएं मंजूर करते कहा,''भोजशाला परिसर और कमाल मौला मस्जिद के विवादित क्षेत्र का धार्मिक स्वरूप वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर वाली भोजशाला के रूप में तय किया जाता है।''
खंडपीठ ने पाया कि इस स्थल पर हिंदू पूजा-अर्चना की निरंतरता कभी समाप्त नहीं हुई है, भले ही समय के साथ इसे विनियमित किया गया हो।
अदालत ने कहा, "हम इस निष्कर्ष को दर्ज करते हैं कि ऐतिहासिक साहित्य ने स्थापित किया है कि विवादित क्षेत्र का स्वरूप भोजशाला के रूप में था जो परमार वंश के राजा भोज से जुड़ा संस्कृत अध्ययन केंद्र था और राजा भोज के काल से संबंधित संदर्भों सहित साहित्य और स्थापत्य-संबंधी संदर्भ संकेत देते हैं कि धार में देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर विद्यमान था।"
हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ताओं ने लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी वाग्देवी की प्रतिमा को भारत वापस लाने और उसे भोजशाला परिसर के भीतर पुनः स्थापित करने की गुहार भी की थी।
इस पर अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने भारत सरकार के समक्ष पहले ही इस बारे में कई अभ्यावेदन प्रस्तुत किए हैं और सरकार इन पर विचार कर सकती है।
उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी कि भारत सरकार और एएसआई भोजशाला मंदिर और इसमें संस्कृत शिक्षा के मामलों के प्रशासन और प्रबंधन के संबंध में निर्णय लेंगे और एएसआई कानूनी प्रावधानों के मुताबिक इस संपत्ति का समग्र प्रशासन और प्रबंधन जारी रखेगा।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि एएसआई का इस परिसर में धार्मिक पहुंच के परिरक्षण, संरक्षण और विनियमन पर 'पूर्ण पर्यवेक्षी नियंत्रण' होगा।
अदालत ने यह भी कहा कि हर सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वह पुराने स्मारकों व इमारतों, पुरातात्विक तथा ऐतिहासिक महत्व के मंदिरों, गर्भगृहों और देवी-देवताओं से जुड़े आध्यात्मिक महत्व वाले स्थलों का संरक्षण सुनिश्चित करे।
उच्च न्यायालय में मामले की सुनवाई के दौरान हिंदू, मुस्लिम और जैन समुदायों के याचिकाकर्ताओं ने विस्तृत दलीलें पेश कीं थीं और विवादित स्मारक में अपने-अपने समुदाय के लोगों के लिए उपासना का विशेष अधिकार मांगा था।
खंडपीठ ने मुस्लिम और जैन पक्षों की ओर से दायर चार याचिकाएं खरिज कर दीं।
अदालत ने हालांकि कहा कि अगर मुस्लिम समुदाय की ओर से धार जिले में मस्जिद बनाने के लिए जमीन आवंटन की अर्जी दी जाती है, तो राज्य सरकार इस पर कानूनी प्रावधानों के मुताबिक विचार कर सकती है।
भोजशाला को लेकर विवाद शुरू होने के बाद एएसआई ने सात अप्रैल 2003 को एक आदेश जारी किया था। इसमें हिंदुओं को प्रत्येक मंगलवार भोजशाला में पूजा करने की अनुमति दी गई थी, जबकि मुस्लिमों को हर शुक्रवार इस जगह नमाज अदा करने की इजाजत दी गई थी।
उच्च न्यायालय ने 11 मार्च 2024 को एएसआई को भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था।
एएसआई ने 22 मार्च 2024 से इस परिसर का सर्वेक्षण शुरू किया था। एएसआई ने 98 दिनों के विस्तृत सर्वेक्षण के बाद 15 जुलाई 2024 को उच्च न्यायालय में अपनी रिपोर्ट पेश की थी।
अदालत ने कहा,"यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि ज्ञान की एक शाखा के रूप में पुरातत्व, सीखने के विज्ञान से ही अपना आधार प्राप्त करता है।
यह वह बुद्धिमत्ता, अनुभव और दूरदृष्टि है जो व्याख्या की प्रक्रिया का आधार बनती है। इसलिए न्यायालय एएसआई द्वारा किए गए ऐसे बहु-विषयक वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर निकाले गए निष्कर्षों पर तथा भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकारों पर निश्चिंत होकर भरोसा कर सकता है।''
भाषा हर्ष जितेंद्र
जितेंद्र
1505 1810 इंदौर