भाई की हत्या के मामले में 82 वर्षीय दोषी की अपील खारिज, राहत देने से अदालत का इनकार
सं, राजेंद्र रवि कांत
- 28 Jul 2026, 11:18 PM
- Updated: 11:18 PM
प्रयागराज, 28 जुलाई (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने वर्ष 1984 में अपने भाई की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए 82 वर्षीय व्यक्ति की अपील खारिज करते हुए उसे अपनी आजीवन कारावास की शेष सजा भुगतने के लिए आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों में ऐसा कोई कम करने वाला आधार नहीं है, जिसके चलते अपीलकर्ता की दोषसिद्धि को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 (हत्या) से बदलकर धारा 304 भाग-दो (गैर इरादतन हत्या) में परिवर्तित किया जा सके।
अदालत ने अपील खारिज करते हुए दोषी की उस याचिका को भी अस्वीकार कर दिया, जिसमें उसने अब तक भुगती गई सजा को ही पर्याप्त मानते हुए राहत देने का अनुरोध किया था।
अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर राहत नहीं दी जा सकती कि अपीलकर्ता अब 82 वर्ष का हो चुका है और अपील लंबित रहने के दौरान करीब चार दशक तक जमानत पर रहा।
अदालत ने 17 जुलाई को दिए गए अपने फैसले में कहा, ''प्रस्तुत साक्ष्य में ऐसा कोई अचानक और गंभीर उकसावा या अचानक हुई लड़ाई का तथ्य सामने नहीं आया, जिसके आधार पर अदालत भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 के तहत दोषसिद्धि को हटाकर अपीलकर्ता को धारा 304 भाग-दो के तहत दोषी ठहराने की संभावना पर विचार कर सके।''
अदालत ने कहा कि यह तथ्य परेशान करने वाला है कि अपीलकर्ता को 40 वर्ष बाद फिर जेल जाना पड़ेगा, लेकिन वह इस मामले में ज्यादा राहत नहीं दे सकती क्योंकि उसके पास संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत उच्चतम न्यायालय को प्राप्त विशेष शक्तियां नहीं हैं।
अपीलकर्ता बाबू लाल को निचली अदालत ने अक्टूबर 1984 में उसके भाई की हत्या का दोषी ठहराया था। आरोप था कि उसने कृषि कार्य में खुदाई के लिए इस्तेमाल होने वाले औजार 'सबरी' से बार-बार हमला कर अपने भाई की हत्या की थी।
अपीलकर्ता के वकील ने दलील दी थी कि जिस वस्तु के इस्तेमाल का आरोप लगाया गया है, वह कोई विशेष रूप से हत्या के लिए बनाया गया हथियार नहीं था और उसका इस्तेमाल भी कुंद हिस्से से किया गया था। इससे यह संकेत मिलता है कि आरोपी का मृतक को मारने का इरादा नहीं था।
वकील ने यह भी दलील दी कि यदि अभियोजन पक्ष के पूरे मामले को सही और संदेह से परे साबित मान लिया जाए, तब भी आरोपी को अधिकतम आईपीसी की धारा 325 (गंभीर चोट पहुंचाना) के तहत ही दोषी ठहराया जा सकता था।
अदालत ने कहा, ''हत्या करने के इरादे को केवल हथियार की प्रकृति के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। विशेष रूप से, आरोपी की मंशा का निर्धारण इस बात से किया जाना चाहिए कि उसने मानव शरीर के किस हिस्से को निशाना बनाया और क्या उसे यह जानकारी थी कि किसी संवेदनशील अंग पर उस वस्तु से प्रहार करने पर गंभीर चोट लग सकती है, जो सामान्य परिस्थितियों में मृत्यु का कारण बन सकती है या मृत्यु का परिणाम दे सकती है।''
भाषा
सं, राजेंद्र रवि कांत
2807 2318 प्रयागराज