मप्र: आईआईटी इंदौर की नयी तकनीक, सिर्फ सात मिनट में कचरे से तैयार होंगे हरित रसायन
जितेंद्र
- 28 Jul 2026, 08:43 PM
- Updated: 08:43 PM
इंदौर (मध्यप्रदेश), 28 जुलाई (भाषा) कार्बन डाइऑक्साइड और बायोडीजल उत्पादन से निकलने वाले ग्लिसरोल जैसे अपशिष्ट पदार्थ अब पर्यावरण के लिए समस्या नहीं, बल्कि उपयोगी संसाधन बन सकते हैं।
इंदौर के भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है जिससे इन दोनों पदार्थों से केवल सात मिनट में प्राकृतिक रूप से नष्ट होने वाला (बायोडिग्रेडेबल) प्लास्टिक और स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में काम आने वाले हरित रसायन तैयार किए जा सकते हैं।
आईआईटी इंदौर की ओर से मंगलवार को जारी विज्ञप्ति में बताया गया कि संस्थान के रसायन विज्ञान विभाग के सह-प्राध्यापक डॉ. अमरेंद्र के. सिंह की अगुवाई में किए गए इस अनुसंधान के निष्कर्ष अंतरराष्ट्रीय जर्नल 'ग्रीन केमिस्ट्री' में प्रकाशित हुए हैं।
विज्ञप्ति के मुताबिक, अनुसंधानकर्ताओं ने कार्बन डाइऑक्साइड के सुरक्षित रूप और ग्लिसरोल को मिलाकर नयी प्रक्रिया विकसित की है।
इसमें विशेष रूप से तैयार किए गए रूथेनियम आधारित उत्प्रेरक (रासायनिक प्रक्रिया की गति तेज करने वाला पदार्थ) और माइक्रोवेव तकनीक का उपयोग किया गया जिससे रासायनिक प्रक्रिया करीब 50 डिग्री सेल्सियस तापमान पर महज सात मिनट में पूरी हो जाती है।
अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार सामान्य तौर पर ऐसी प्रक्रिया में कई घंटे लगते हैं और अधिक तापमान व दाब की भी जरूरत होती है।
उन्होंने बताया कि आईआईटी इंदौर की विकसित तकनीक से लैक्टिक एसिड और फॉर्मिक एसिड बनते हैं।
लैक्टिक एसिड का उपयोग 'बायोडिग्रेडेबल' प्लास्टिक बनाने में किया जाता है और यह सौंदर्य प्रसाधन व दवा उद्योग में भी उपयोगी है।
वहीं, फॉर्मिक एसिड का इस्तेमाल हाइड्रोजन के सुरक्षित भंडारण और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी तकनीकों में किया जाता है।
आईआईटी इंदौर के निदेशक प्रो. सुहास जोशी ने कहा,"हमारे संस्थान में विकसित तकनीक विज्ञान के जरिये वास्तविक समस्याओं के समाधान का उदाहरण है। कार्बन डाइऑक्साइड और औद्योगिक अपशिष्ट को उपयोगी हरित रसायनों में बदलकर अनुसंधानकर्ताओं ने टिकाऊ विनिर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।" अनुसंधान के प्रमुख डॉ. अमरेंद्र के. सिंह ने कहा कि यह तकनीक पर्यावरणीय चुनौतियों से जुड़े अपशिष्ट पदार्थों को उपयोगी उत्पादों में बदलने का व्यावहारिक रास्ता दिखाती है और टिकाऊ अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दे सकती है।
भाषा हर्ष जितेंद्र
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