असम समझौते की तार्किकता पुनः स्थापित हुई, विपक्षी दलों ने शीर्ष अदालत के फैसले का स्वागत किया
नोमान रंजन
- 17 Oct 2024, 09:17 PM
- Updated: 09:17 PM
नयी दिल्ली, 17 अक्टूबर (भाषा) असम समझौते पर हस्ताक्षर करने वालों में शामिल अखिल असम छात्र संघ (एएएसयू) तथा सभी विपक्षी दलों ने कट-ऑफ तिथि को लेकर उच्चतम न्यायालय के फैसले का बृहस्पतिवार को स्वागत करते हुए कहा कि इसने ऐतिहासिक समझौते की “तार्किकता” को पुनः स्थापित किया है।
एएएसयू और अन्य ने फैसले को “ऐतिहासिक” बताया, जबकि कानून के प्रावधान को चुनौती देने वाले असम संमिलिता महासंघ (एएसएम) ने फैसले को “दुर्भाग्यपूर्ण” करार देते हुए कहा कि यह राज्य को विदेशियों के लिए “डंपिंग ग्राउंड” बना देगा। वहीं, मामले में पक्षकार रहे मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद के दोनों समूहों ने भी फैसले का स्वागत किया है।
दूसरी ओर, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने सतर्कता बरतते हुए कहा कि सरकार अब इस बात पर विचार करेगी कि असम के मूल लोगों के हितों की रक्षा कैसे की जाए।
उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, जो एक जनवरी 1966 से 25 मार्च 1971 तक बांग्लादेश से असम आए प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करती है।
प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि असम समझौता अवैध प्रवास की समस्या का राजनीतिक समाधान है।
असम समझौते पर 1985 में छह साल तक चले हिंसक विदेशी विरोधी आंदोलन के बाद हस्ताक्षर किए गए थे। इस समझौते में अन्य प्रावधानों के अलावा यह भी कहा गया था कि 25 मार्च 1971 को या उसके बाद असम आने वाले सभी विदेशियों का पता लगाया जाएगा और उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए जाएंगे तथा उन्हें निर्वासित करने के लिए कदम उठाए जाएंगे।
समझौते के अंतर्गत आने वाले लोगों की नागरिकता से निपटने के लिए एक विशेष प्रावधान के रूप में धारा 6ए को 1985 में नागरिकता अधिनियम में शामिल किया गया था।
एएएसयू ने फैसले का स्वागत किया और कहा कि यह असम के संघर्षशील लोगों की जीत है जो पिछले चार दशकों से निस्वार्थ भाव से असम समझौते के पक्ष में खड़े रहे हैं।
एएएसयू ने एक बयान में कहा, “इस फैसले ने असम आंदोलन और असम समझौते की तार्किकता को पुनः स्थापित किया है। हम इस ऐतिहासिक अवसर पर शहीदों को श्रद्धांजलि देते हैं। हम पुनः मांग करते हैं कि असम समझौते के प्रत्येक प्रावधान को पूर्ण रूप से लागू किया जाए।”
एएएसयू के मुख्य सलाहकार समुज्जल भट्टाचार्य ने ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, “हम उच्चतम न्यायालय के फैसले का तहे दिल से स्वागत करते हैं। यह एक ऐतिहासिक फैसला है। इससे यह स्थापित हो गया है कि असम आंदोलन वास्तविक कारणों से किया गया था और असम समझौते के सभी प्रावधानों को अब उच्चतम न्यायालय ने कानूनी मान्यता दे दी है।”
नागरिकता अधिनियम में धारा 6ए को शामिल किए जाने को चुनौती देने वाले एएएसयू के पूर्व नेता मती-उर-रहमान ने कहा कि उन्हें इस तरह के फैसले की उम्मीद नहीं थी।
उन्होंने एएसएम की ओर से उच्चतम न्यायालय में मूल याचिका दायर की थी। वे असम में सभी अवैध प्रवासियों का पता लगाने और उन्हें निर्वासित करने के लिए ‘कट-ऑफ’ वर्ष के रूप में 1951 को निर्धारित करना चाहते थे, न कि 1971 को। दरअसल, असम समझौते में ‘कट ऑफ’ वर्ष 1971 निर्धारित किया गया है।
रहमान ने फोन पर ’पीटीआई-भाषा’ से कहा, “हम चाहते हैं कि असम के मूल निवासियों के अधिकारों की पूरी तरह से रक्षा की जाए और इसलिए हम असम से सभी अवैध प्रवासियों को निर्वासित करने के लिए 1951 की कट-ऑफ तिथि की मांग कर रहे थे।”
उन्होंने कहा, “उच्चतम न्यायालय का फैसला असम के मूल निवासियों के अधिकारों को खतरे में डालेगा। आप असम को अवैध प्रवासियों का ‘डंपिंग ग्राउंड’ नहीं बना सकते। यह फैसला बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।”
रहमान ने कहा कि उनका संगठन फैसले का सावधानीपूर्वक अध्ययन करेगा और देखेगा कि क्या इसे बड़ी संवैधानिक पीठ में चुनौती दी जा सकती है।
अखिल असम अल्पसंख्यक छात्र संघ (एएएमएसयू) के अध्यक्ष रेजा-उल-करीम सरकार ने कहा कि कुछ निहित स्वार्थी तत्व नागरिकता के लिए आधार वर्ष के रूप में 1951 की मांग करके हिंसा के दिनों को वापस लाना चाहते थे, "लेकिन उच्चतम न्यायालय ने असम के भविष्य के लिए एक ऐतिहासिक फैसला दिया है।”
मामले में पक्षकार जमीयत उलेमा-ए-हिंद (एएम समूह) के प्रमुख मौलाना अरशद मदनी ने एक बयान में इस फैसले पर संतोष जताया और कहा कि “हम अदालत के इस फैसले का स्वागत करते हैं। इसमें धारा 6ए की बहुत ही उचित और सही व्याख्या की गई है। असम में नागरिकता को लेकर जो भय और आशंका के बादल छाए थे, वह संविधान पीठ के फैसले से काफी हद तक छंट गए हैं।”
उन्होंने यह भी कहा कि इस फैसले से न्यायपालिका पर आम लोगों का विश्वास बढ़ा है।
वहीं एक अन्य बयान में जमीयत (एमएम समूह) के अध्यक्ष एवं राज्यसभा के पूर्व सदस्य मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि शीर्ष अदालत के फैसले से उन लोगों को राहत मिलेगी जो नागरिकता की उम्मीद खो चुके थे।
असम के मंत्री जयंत मल्ला बरुआ ने कहा कि सभी को उच्चतम न्यायालय के फैसले का पालन करना होगा, लेकिन सभी को असम के मूल निवासियों और उनके हितों की चिंता है।
विपक्षी कांग्रेस ने इस फैसले की सराहना की और कहा कि पार्टी ने असम समझौते का सदैव सम्मान किया है जिसपर तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने हस्ताक्षर किए थे।
असम कांग्रेस के अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा ने कहा, “ उस समय की भाजपा ने भी इसका स्वागत किया था, लेकिन आजकल मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा इस ऐतिहासिक समझौते के आधार पर अशांत माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। वह गंदी राजनीति कर रहे हैं और उनकी कुछ चालों में से एक सीएए को लागू करना है।”
विपक्ष के नेता देवव्रत सैकिया ने कहा कि यह सभी के लिए ऐतिहासिक दिन है क्योंकि इस फैसले ने असम समझौते को वैधता प्रदान की है।
एआईयूडीएफ के सांगठनिक महासचिव और विधायक अमीन-उल-इस्लाम ने फैसले का स्वागत किया और कहा कि इसी तारीख के आधार पर 1,600 करोड़ रुपये खर्च करके राष्ट्रीय नागरिक पंजी(एनआरसी) बनाया गया और इसमें 19 लाख लोगों को शामिल नहीं किया गया।
उन्होंने कहा, “इस फैसले ने एक तरह से एनआरसी को भी वैध बना दिया है। सरकार को इसी के अनुरूप काम करना चाहिए।”
रायजोर दल के प्रमुख और विधायक अखिल गोगोई ने कहा कि इस फैसले के बाद कट-ऑफ तारीख पर कोई और बहस नहीं होनी चाहिए और सरकार को हिंदू, मुस्लिम, जैन, सिख या किसी भी अन्य धर्म के सभी विदेशियों को निर्वासित करने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
असम से आने वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की राज्यसभा सदस्य सुष्मिता देव ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, “आशा है कि असम सरकार और मुख्यमंत्री केवल वोट के लिए समझौते को विकृत करके पिछले दरवाजे से इस कट-ऑफ तिथि में हस्तक्षेप करना बंद कर देंगे।”
भाषा नोमान