कोविड महामारी के दौरान शिक्षा के प्रौद्योगिकी आधारित होने के अनपेक्षित और अवांछित परिणाम : यूनेस्को की रिपोर्ट
धीरज प्रशांत
- 08 Sep 2024, 06:37 PM
- Updated: 06:37 PM
(गुंजन शर्मा)
नयी दिल्ली, आठ सितंबर (भाषा) कोविड-19 महामारी ने पढ़ाई को विद्यालयों से शैक्षिक प्रौद्योगिकियों की ओर ऐसी गति और पैमाने पर धकेल दिया, जिसकी कोई ऐतिहासिक मिसाल नहीं है। इसकी वजह से कई अनपेक्षित और अवांछनीय परिणाम सामने आए हैं। यूनेस्को की शिक्षा टीम ने यह बात अपनी रिपोर्ट में कही है।
यूनेस्को की टीम ने ‘एन-एडटेक ट्रेजेडी’ नाम से तैयार इस रिपोर्ट को एक पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित किया है। इसमें पढ़ाई के तौर तरीके प्रौद्योगिकी आधारित होने के अनेक प्रतिकूल और अनपेक्षित परिणामों का विश्लेषण किया गया है।
इसमें बताया गया है कि किस प्रकार प्रौद्योगिकी-प्रधान समाधानों ने वैश्विक स्तर पर अधिकांश विद्यार्थियों को पीछे छोड़ दिया तथा उन अनेक तरीकों का विवरण दिया गया है जिनसे शिक्षा में गिरावट आई, जबकि प्रौद्योगिकी उपलब्ध थी और अपेक्षित रूप से काम कर रही थी।
इसमें कहा गया है कि आशंका है कि स्कूली शिक्षा से वंचित होने का असर कई वर्षों तक रहेगा, व्यक्तिगत रूप से व्यक्तियों के लिए तथा देशों, क्षेत्रों और स्थानीय समुदायों के स्तर पर भी।
संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) की शिक्षा टीम के विशेषज्ञों ने ‘पीटीआई-भाषा’ को बताया कि रिपोर्ट में सबक और सिफारिशें दी गई हैं, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि प्रौद्योगिकी समावेशी, न्यायसंगत और मानव-केंद्रित सार्वजनिक शिक्षा के सार्वभौमिक प्रावधान को सुनिश्चित करने के प्रयासों को बाधित करने के बजाय उन्हें सुगम बनाए।
रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘लाखों विद्यार्थी के लिए औपचारिक शिक्षा पूरी तरह से प्रौद्योगिकी पर निर्भर हो गई। फिर चाहे वह इंटरनेट से जुड़े डिजिटल उपकरण के जरिये हों, टेलीविजन या रेडियो के माध्यम से। स्कूलों के बाहर इस्तेमाल की जा सकने वाली शैक्षिक प्रौद्योगिकियों का बड़े पैमाने पर उपयोग रोग संचरण के बारे में एक कठोर सत्य पर आधारित था...।”
इसमें कहा गया, ‘‘स्कूलों को जहां बंद करने के लिए मजबूर किया गया क्योंकि उनमें बड़ी संख्या में बच्चे और वयस्क एक-दूसरे के बहुत करीब रहते थे, वहीं विद्यार्थियों को प्रौद्योगिकी का उपयोग करने के लिए कहा गया क्योंकि इससे सामाजिक दूरी और घर पर रहने के निर्देशों का पालन करने में मदद मिली।’’
रिपोर्ट के मुताबिक चूंकि औपचारिक शिक्षा के केंद्र के रूप में विद्यालयों में प्रत्यक्ष उपस्थिति में शिक्षा का स्थान प्रौद्योगिकी के माध्यम वाली शिक्षा ने ले लिया है, इसलिए शिक्षा को अनिवार्य बनाने की प्रतिबद्धता के अनुरूप सरकारों द्वारा प्रौद्योगिकी के उपयोग को व्यापक रूप से अनिवार्य बना दिया गया।
विशेषज्ञों ने रेखांकित किया कि महामारी के दौरान विद्यार्थियों की शैक्षणिक प्रगति स्कूल बंद न होने की अपेक्षा नाटकीय रूप से कम रही।
रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन देशों में विद्यार्थी आमतौर पर केवल कुछ वर्ष की औपचारिक शिक्षा पूरी करते हैं, वहां कोविड-19 के कारण स्कूली शिक्षा में व्यवधान तथा वैकल्पिक शिक्षा प्रदान करने में शिक्षा-तकनीक की विफलता या अपर्याप्तता के कारण कुछ विद्यार्थी अपने जीवन का छठा या उससे अधिक वर्ष शिक्षा से वंचित रह गए।
इसमें कहा गया, ‘‘हालांकि मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाली प्रौद्योगिकी ने कई विद्यार्थियों को शिक्षा जारी रखने में मदद की, परंतु कई अन्य पीछे छूट गए। अलगाव और असमानताएं बढ़ गईं। उपलब्धि के स्तर में गिरावट आई, यहां तक कि दूरस्थ शिक्षा तक पहुंच रखने वालों के लिए भी।
रिपोर्ट के मुताबिक ‘‘शैक्षणिक अनुभव सीमित हो गए हैं। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में गिरावट आई है। निजीकरण में तेजी आई है, जिससे जनकल्याण और मानव अधिकार के रूप में शिक्षा की अद्वितीय स्थिति को खतरा पैदा हो गया।’’
रिपोर्ट के मुताबिक, ‘‘प्रौद्योगिकी आधारित शिक्षा के समर्थकों का मानना था कि स्कूल बंद होने की बड़ी चुनौतियों का सामना तकनीक से किया जा सकता है और गहन प्रौद्योगिकी एकीकरण से शिक्षा में बेहतरी आएगी। लेकिन ये उच्च उम्मीदें और अपेक्षाएं तब धराशायी हो गईं, जब कोविड-19 के कारण देश भर में औपचारिक शिक्षा को बनाए रखने के लिए इन प्रौद्योगिकयों पर जल्दबाजी में अमल किया गया।’’
इसमें कहा गया, ‘‘शिक्षा-तकनीक की ओर अचानक हुए बदलाव ने शिक्षकों, विद्यालयों और समुदायों से अधिकार हटाकर निजी, लाभ-प्राप्त हितों की ओर स्थानांतरित करने की चिंताजनक प्रक्रिया को गति दी।’’
रिपोर्ट के मुताबिक इसके अतिरिक्त, सेंसरशिप, विज्ञापन, पूर्ण नियंत्रण, धमकी और निगरानी जो अक्सर डिजिटल परिवर्तन के वर्तमान मॉडल की विशेषता है, ने शिक्षा को कम स्वतंत्र बना दिया और यकीनन, यथास्थिति की आलोचना और सकारात्मक बदलाव को सुविधाजनक बनाने में कम सक्षम बना दिया है।’’
भाषा धीरज