उच्चतम न्यायालय ने नये निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति पर रोक के अनुरोध वाली याचिकाएं खारिज कीं
शफीक माधव
- 21 Mar 2024, 06:52 PM
- Updated: 06:52 PM
नयी दिल्ली, 21 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने दो नये निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति पर रोक लगाने का अनुरोध करने वाली याचिकाएं बृहस्पतिवार को खारिज करते हुए कहा कि चुनाव नजदीक हैं और इससे ‘‘अव्यवस्था और अनिश्चितता’’ की स्थिति बनेगी।
न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यालय शर्तें) अधिनियम, 2023 पर भी अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया।
पीठ ने कहा कि वह अधिनियम, 2023 की वैधता को चुनौती देने वाली मुख्य याचिकाओं पर गौर करेगी। पीठ ने केंद्र से छह सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने को कहा और मामले की अगली सुनवाई पांच अगस्त को नियत की।
नये कानून को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं से पीठ ने कहा, ‘‘इस समय हम कानून पर रोक नहीं लगा सकते। इससे अव्यवस्था और अनिश्चितता की स्थिति पैदा होगी और हम अंतरिम आदेश के माध्यम से इस पर रोक नहीं लगा सकते। नये निर्वाचन आयुक्तों पर कोई आरोप नहीं हैं।’’
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से निर्वाचन आयुक्तों की हालिया नियुक्ति पर लगाने का अनुरोध किया।
पीठ ने कहा, ‘‘हम नियुक्ति पर रोक की अर्जियों को खारिज करते हैं।’’
शीर्ष अदालत कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें कांग्रेस नेता जया ठाकुर और एनजीओ ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ द्वारा दायर याचिकाएं भी शामिल हैं। इन याचिकाओं में नए निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया था और 2023 के कानून की वैधता को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत भारत के प्रधान न्यायाधीश को नए मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों को चुनने वाली चयन समिति से बाहर रखा गया है।
यह रेखांकित करते हुए कि निर्वाचन आयुक्तों को स्वतंत्र और निष्पक्ष होना चाहिए, पीठ ने कहा कि आजादी के बाद से चुनाव होते रहे हैं और देश में अतीत में बहुत अच्छे निर्वाचन आयुक्त रहे हैं।
इसने कहा कि पहले निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति कार्यपालिका द्वारा की जाती थी और अब उन्हें एक कानून के तहत नियुक्त किया जा रहा है।
न्यायमूर्ति दत्ता ने केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा, ‘‘न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए। हम जन प्रतिनिधित्व अधिनियम पर गौर कर रहे हैं, जो मेरे अनुसार संविधान के बाद सर्वोच्च है। जनता के लिए भौंहें चढ़ाने की कोई गुंजाइश क्यों छोड़ें?’’
एनजीओ की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने 2023 के शीर्ष अदालत के फैसले का अनुपालन न करने का आरोप लगाते हुए कहा कि भारत के प्रधान न्यायाधीश को चयन समिति से हटा दिया गया है।
न्यायालय ने कहा कि इसकी संविधान पीठ के 2023 के फैसले में कहीं भी यह नहीं कहा गया कि निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति वाली चयन समिति में न्यायपालिका से एक सदस्य होना चाहिए।
इसने कहा कि 2023 के फैसले का मकसद संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक की अवधि के लिए था, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और भारत के प्रधान न्यायाधीश को शामिल करते हुए एक चयन समिति गठित करने का प्रस्ताव किया गया था।
पीठ ने कहा कि वह प्रथम दृष्टया भूषण की इस दलील से सहमत है कि दो नये निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति के लिए अपनाई गई प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी।
सुनवाई के दौरान पीठ ने दो नए निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए अपनाई गई प्रक्रिया पर केंद्र से सवाल करते हुए कहा कि निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति पर विचार करने के लिए चयन समिति को और अधिक समय दिया जाना चाहिए था।
पीठ ने कहा, ‘‘निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनी खोज समिति को उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि को समझने के लिए उचित समय दिया जाना चाहिए था।’’
मेहता ने पीठ को बताया कि दो नए निर्वाचन आयुक्त एक खोज समिति द्वारा सुझाए गए 200 नामों की सूची में से चुने गए छह नामों में शामिल थे।
इसने कहा, ‘‘रिकॉर्ड से पता चलता है कि एक रिक्ति के लिए, पांच नाम थे। दो के लिए, आप केवल छह नाम भेजते हैं। 10 क्यों नहीं? वे 200 नामों पर विचार कर सकते हैं, लेकिन समय क्या दिया गया है, शायद 2 घंटे। 200 नामों को 2 घंटे में विचार किया जाएगा? आप पारदर्शी हो सकते थे।’’
सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू को हाल में निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किया गया था।
यह नियुक्ति 19 अप्रैल से लोकसभा चुनाव शुरू होने से पहले की गई है।
नए कानून के तहत, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति में नेता प्रतिपक्ष और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री शामिल होते हैं।
उच्चतम न्यायालय ने दो मार्च 2023 को दी गई अपनी व्यवस्था में कहा था कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्तियां प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) की एक समिति की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाएंगी।
भाषा शफीक