पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ईंट भट्ठा मजदूरों ने सौर ऊर्जा का इस्तेमाल करना शुरू किया
रंजन रंजन सुभाष
- 18 Aug 2024, 05:00 PM
- Updated: 05:00 PM
(उज्मी अतहर)
कोडियागंज/पिलखना (उत्तर प्रदेश), 18 अगस्त (भाषा) पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ईंट भट्ठों के मालिक इससे होने वाले प्रदूषण को घटाने और बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिये कोयले पर अपनी निर्भरता को कम करते हुये सोलर पैनल लगवा रहे हैं, जो बरसात के मौसम में भी ऊर्जा की उनकी जरूरतों को पूरा कर रहा है।
भीषण गर्मी के बाद बारिश की शुरूआत हो चुकी है, लेकिन सोलर पैनलों में संग्रहित सौर ऊर्जा विद्युत आपूर्ति जारी रखे हुए है। पारंपरिक ईंट भट्ठा उद्योग अब न केवल प्रदूषण घटा रहा है बल्कि क्षेत्र के गांवों को बिजली और डिजिटल कनेक्टिविटी भी प्रदान कर रहा है।
अलीगढ़ जिले के कोडियागंज, पिलखना और अकराबाद में आठ ईंट भट्ठों ने बिजली की अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए कोयले को छोड़ कर सौर ऊर्जा का इस्तेमाल शुरू किया है।
उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, यह जिले के 555 ईंट भट्ठों का एक बहुत छोटा सा हिस्सा है, हालांकि, उनका कहना है कि यह महज एक शुरूआत है।
एक ईंट भट्ठे के मालिक ओम प्रकाश शर्मा ने कहा कि शुरुआती लागत सात लाख रुपये थी, लेकिन इसके (सोलर पैनल के) दीर्घकालिक लाभ हैं।
उन्होंने कहा कि उन्होंने 455 वाट के 16 सौर पैनल लगाए हैं, जिनका उपयोग वे ईंट भट्ठे के जेनरेटर को बिजली उपलब्ध करने के लिए करते हैं।
शर्मा ने पीटीआई-भाषा को बताया, ‘‘हम सौर पैनलों के माध्यम से हर महीने लगभग 50,000 रुपये बचाते हैं।’’
उन्होंने कहा कि वह अपने भट्ठों में काम करने वाले लोगों की झोपड़ियों को भी बिजली मुहैया कर रहे है।
उन्होंने कहा, ‘‘इसमें मुझे कुछ भी अतिरिक्त खर्च नहीं करना पड़ा और मुझे लगा कि इससे उन्हें भी मदद मिलेगी।’’
सौर पैनलों का इस्तेमाल जेनरेटर को बिजली देने के लिए किया जाता है, जिनका उपयोग ईंट भट्ठों के विभिन्न कामों के लिये किया जाता है। इसमें श्रमिकों की झोपड़ियों में बिजली की आपूर्ति करना भी शामिल है। पहले इसके लिए डीजल एवं कोयले का इस्तेमाल किया जाता था।
बिहार के गया जिले से तीन बच्चों के साथ काम की तलाश में कोडि़यागंज आयी कलावती ने पहली बार सौर ऊर्जा की ‘शक्ति’ को देखा।
पिछले साल अक्टूबर में, वह पहली बार अपने गांव से बाहर निकली थी, और उसे याद है कि वह यह देखकर हैरान थी कि श्रमिकों की झोपड़ियों में भी बिजली है।
उसने कहा, ‘‘जब मैंने पहली बार सोलर पैनल देखे, तो मुझे नहीं पता था कि वे क्या हैं। यह बहुत बेतुका लग रहा था। मुझे लगा कि यह महंगा है और अगर मालिक के पास पैसा है तो उसने हमारी मजदूरी क्यों नहीं बढ़ाई।’’
उसने कहा, ‘‘हमें बताया गया कि इसका उपयोग कोयले और तेल (डीजल) की जगह किया जाएगा, और हम सोच रहे थे कि इससे हमें कैसे और क्यों कोई फर्क पड़ सकता है। जब तक हमने अपनी झोपड़ियों तक तार खींचे जाते नहीं देखे, तब तक हमें यकीन नहीं हो रहा था कि इससे हमें भी लाभ होगा।’’
तीन बच्चों की मां ने कहा कि उनके बच्चों की उम्र छह साल से कम है और अब उनके पास बिजली की रोशनी और पंखे भी हैं।
श्रमिक अपने मोबाइल फोन भी चार्ज कर सकते हैं, जो पहले से बहुत अलग है जब वे तेल के दीयों पर निर्भर थे और बिजली की चोरी करते थे।
ईंट भट्ठा मजदूर अनिल (18) ने कहा, ‘‘पहले मुझे लगभग 3.5 किलोमीटर दूर पिलखना गांव जाना पड़ता था और 10 रुपये देकर अपना मोबाइल फोन चार्ज कराना पड़ता था। अब मैं इसे घर पर ही कर सकता हूं।’’
अनिल ने कहा कि यह केवल मोबाइल फोन की बात नहीं है, अब वह रात में पढ़ाई कर सकता है और अपनी 10वीं कक्षा की परीक्षा में शामिल हो सकता है तथा इसके अलावा, सर्पदंश और जानवरों के हमले का जोखिम भी कम हो गया है।
बिहार के गोपालगंज जिले से आये श्रमिक राम कुमार ने कहा, ‘‘पहले, हमें पूरी रात जागना पड़ता था। कई बार तो बारी-बारी से पहरा देना पड़ता था, लेकिन अब सुकून से सो सकते हैं।’’
समय के साथ, पर्यावरण के प्रति जागरूकता में कुछ हद तक वृद्धि हुई है।
केकेके ब्रिक्स के मालिक सुधीर गुप्ता के अनुसार, प्रदूषण कम करने के बारे में राज्य सरकार की सलाह ने उन्हें सौर पैनल लगाने के लिए प्रेरित किया।
उन्होंने कहा, ‘‘यह एकमात्र तरीका था जिससे मुझे लगा कि मैं कोयले और डीजल पर अपनी निर्भरता घटा सकता हूं।’’
भाषा रंजन रंजन