समान नागरिक संहिता लाने का प्रयास ‘अस्वीकार्य’, प्रधानमंत्री की टिप्पणी ‘आपत्तिजनक’: एआईएमपीएलबी
देवेंद्र माधव
- 17 Aug 2024, 08:30 PM
- Updated: 08:30 PM
नयी दिल्ली, 17 अगस्त (भाषा) प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा ‘‘धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता’’ की वकालत करने के कुछ दिन बाद, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) ने विधि आयोग के 2018 के इस कथन को शनिवार को रेखांकित किया कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय है।
एआईएमपीएलबी ने कहा कि यूसीसी लाने का कोई भी प्रयास ‘‘अस्वीकार्य’’ होगा।
इसने कहा कि वह प्रधानमंत्री के ‘धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता’ के आह्वान और धार्मिक पर्सनल लॉ को सांप्रदायिक बताने को ‘‘अत्यधिक आपत्तिजनक’’ मानता है।
एआईएमपीएलबी ने स्पष्ट किया कि यह मुसलमानों को ‘‘अस्वीकार्य’’ है, क्योंकि वे मुस्लिम पर्सनल लॉ के साथ कभी समझौता नहीं करेंगे।
एआईएमपीएलबी के प्रवक्ता एस. क्यू. आर. इलियास ने ‘धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता’ लाने संबंधी प्रधानमंत्री की टिप्पणी को लेकर हैरानी जताई।
उन्होंने इसे ‘‘एक सोची-समझी साजिश बताया जिसके गंभीर परिणाम होंगे।’’
उन्होंने एक बयान में कहा कि बोर्ड यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण समझता है कि भारत के मुसलमानों ने कई बार यह स्पष्ट किया है कि उनके पारिवारिक कानून शरिया कानून पर आधारित हैं, जिससे कोई भी मुसलमान किसी भी कीमत पर विचलित नहीं हो सकता।
इसमें कहा गया है कि देश की विधायिका ने स्वयं ‘शरीयत एप्लीकेशन एक्ट, 1937’ को मंजूरी दी है और भारत के संविधान ने अनुच्छेद 25 के तहत धर्म को मानने, उसका प्रचार करने और उसका पालन करने को मौलिक अधिकार घोषित किया है।
इलियास ने कहा कि देश के निर्वाचित प्रतिनिधियों को ऐसी निरंकुश शक्तियों का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। उन्होंने कहा कि संविधान में एक संघवादी राजनीतिक संरचना और बहुलवादी समाज की परिकल्पना की गई है, जहां धार्मिक संप्रदायों और सांस्कृतिक इकाइयों को अपने धर्म का पालन करने और अपनी संस्कृति को बनाए रखने का अधिकार है।
उन्होंने प्रधानमंत्री द्वारा संवैधानिक शब्द समान नागरिक संहिता के स्थान पर ‘सेक्युलर सिविल कोड’ का प्रयोग करने की आलोचना की।
इलियास ने प्रधानमंत्री की मंशा पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि वह केवल शरिया कानून को ही निशाना बना रहे हैं।
उन्होंने कहा, ‘‘धर्म आधारित पारिवारिक कानूनों को सांप्रदायिक बताकर प्रधानमंत्री ने न केवल पश्चिम की नकल की है, बल्कि देश के बहुसंख्यक लोगों का भी अपमान किया है जो धर्म का पालन करते हैं। यह धार्मिक समूहों के लिए अच्छा संकेत नहीं है।’’
उन्होंने कहा कि ‘शरीयत एप्लीकेशन एक्ट’ और हिंदू कानूनों में बदलाव करके धर्मनिरपेक्ष संहिता लाने का कोई भी प्रयास ‘‘निंदनीय और अस्वीकार्य’’ होगा।
इलियास ने कहा कि सरकार को भाजपा सरकार द्वारा नियुक्त विधि आयोग के अध्यक्ष की टिप्पणी को कायम रखना चाहिए, जिन्होंने 2018 में स्पष्ट रूप से कहा था कि समान नागरिक संहिता ‘‘न तो आवश्यक है और न ही वांछनीय है’’।
प्रधानमंत्री मोदी ने बृहस्पतिवार को देश में धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता (एससीसी) की जोरदार वकालत की थी।
मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लालकिले की प्राचीर से अपने संबोधन में समान नागरिक संहिता और इसके बारे में उच्चतम न्यायालय के आदेशों का उल्लेख किया था तथा इस विषय पर देश में गंभीर चर्चा की जरूरत पर बल दिया था।
उन्होंने कहा था, ‘‘देश का एक बहुत बड़ा वर्ग मानता है कि जिस नागरिक संहिता को लेकर हम लोग जी रहे हैं, वह सचमुच में साम्प्रदायिक और भेदभाव करने वाली संहिता है। मैं चाहता हूं कि इस पर देश में गंभीर चर्चा हो और हर कोई अपने विचार लेकर आए।’’
उन्होंने कहा था, ‘‘जो कानून धर्म के आधार पर देश को बांटते हैं, ऊंच-नीच का कारण बन जाते हैं... उन कानूनों का आधुनिक समाज में कोई स्थान नहीं हो सकता। अब देश की मांग है कि देश में धर्मनिरपेक्ष नागरिक संहिता हो।’’
भाषा
देवेंद्र