मजबूत बटालियन बुनियादी ढांचे के लिए वन भूमि के उपयोग पर केंद्र ही ले सकता है निर्णय: एनजीटी
नेत्रपाल पवनेश
- 14 Aug 2024, 09:08 PM
- Updated: 09:08 PM
नयी दिल्ली, 14 अगस्त (भाषा) राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने कहा है कि केवल केंद्र ही यह तय कर सकता है कि आरक्षित वन क्षेत्र में ‘‘मजबूत’’ बटालियन बुनियादी ढांचे का निर्माण करने से वनों के संरक्षण के मुद्दे पर असर पड़ेगा या नहीं।
हरित अधिकरण एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें आरोप लगाया गया है कि असम के वन विभाग ने शिवसागर जिले में गेलेकी रिजर्व फॉरेस्ट के असम-नगालैंड अंतरराज्यीय सीमा क्षेत्र में दूसरी असम कमांडो बटालियन की स्थापना के लिए 28 हेक्टेयर आरक्षित वन भूमि का अवैध रूप से उपयोग परिवर्तन किया गया।
इसमें यह भी आरोप लगाया गया कि तत्कालीन प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) एम. के. यादव द्वारा अनधिकृत अनुमति दी गई थी, जिन्होंने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से सहमति लिए बिना ‘‘वन क्षेत्र के एक बड़े हिस्से का उपयोग परिवर्तन करने के लिए अपनी शक्ति और पद का दुरुपयोग किया’’।
न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति शेओ कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य अरुण कुमार वर्मा की एनजीटी की पूर्वी पीठ ने नौ अगस्त को पारित एक आदेश में कहा कि वर्तमान पीसीसीएफ द्वारा एक हलफनामा दायर किया गया था, जिसमें कहा गया था कि वन बटालियन का निर्माण ‘‘वन संरक्षण और प्रबंधन की एक गतिविधि’’ है तथा इसके लिए कोई भी पेड़ नहीं काटा गया।
पीठ ने कहा कि यह भी कहा गया है कि सीमा पार से प्रवासियों तथा अतिक्रमणकारियों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए एक बड़े बटालियन शिविर की आवश्यकता है।
इसने उल्लेख किया कि हलफनामे में वन भूमि के उपयोग परिवर्तन के गलत इरादे के याचिकाकर्ता के आरोप को निराधार बताया गया है।
पीठ ने कहा कि हलफनामे के अनुसार, पर्यावरण कार्यकर्ता के रूप में काम करने वाला याचिकाकर्ता यह धारणा प्रदान करने की कोशिश कर रहा है कि भूमि का उपयोग वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है, लेकिन यह परियोजना ‘‘जंगल की रक्षा के लिए एक बुनियादी ढांचा’’ है।
एनजीटी ने कहा, ‘‘दिशानिर्देशों के मद्देनजर, हमारा विचार है कि यह निर्णय लेना पीसीसीएफ असम का काम नहीं है कि हथियारों, गोला-बारूद और अत्याधुनिक हथियारों के साथ 800 कर्मियों के लिए मजबूत निर्माण से वन संरक्षण पर असर पड़ेगा या नहीं। चूंकि ऐसे मामले में निर्णय वन (संरक्षण) अधिनियम की धारा 2 की अनिवार्य वैधानिक आवश्यकता के मद्देनजर केंद्र सरकार द्वारा लिया जाता है।’’
इसने कहा, ‘‘यह दिखाने के लिए रिकॉर्ड में कुछ भी नहीं है कि पीसीसीएफ, असम के हलफनामे में उल्लिखित निर्माण के वास्ते वन भूमि उपयोग परिवर्तन के लिए केंद्र सरकार द्वारा कोई अनुमति या मंजूरी दी गई है।’’
इस बीच, अधिकरण ने स्थल का दौरा करने के बाद रिपोर्ट जमा करने के लिए केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के पैनल को चार सप्ताह का समय और दे दिया।
मामले में अगली सुनवाई चार अक्टूबर को होगी।
भाषा नेत्रपाल