जमानत मिलने के बाद हिरासत में भेजे जाने को लेकर गुजरात की न्यायाधीश, पुलिसकर्मी अवमानना के दोषी
देवेंद्र सुभाष
- 07 Aug 2024, 10:05 PM
- Updated: 10:05 PM
नयी दिल्ली, सात अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को गुजरात की एक न्यायाधीश और एक पुलिस अधिकारी को एक मामले में आरोपी को हिरासत में पूछताछ के लिए भेजे जाने को लेकर शीर्ष अदालत की अवमानना का दोषी ठहराया।
आरोपी को हिरासत में पूछताछ के लिए भेजे जाते समय इस तथ्य की अनदेखी की गई थी कि उसे अग्रिम जमानत किसी और ने नहीं, बल्कि शीर्ष अदालत ने ही दी थी।
शीर्ष अदालत ने गुजरात की उक्त न्यायाधीश पर, पुलिस हिरासत प्रदान करते समय ‘‘पक्षपातपूर्ण’’ और ‘‘मनमाने तरीके’’ से काम करने का आरोप लगाया।
न्यायालय ने एक फैसले में कहा कि आपराधिक न्याय प्रणाली के तहत अदालतों को पुलिस हिरासत प्रदान करने से पहले मामले के तथ्यों पर न्यायिक विवेक का उपयोग करने की आवश्यकता होती है, बशर्ते कि यह ‘‘वास्तव में आवश्यक हो।’’
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘अदालतों से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वे जांच एजेंसियों के संदेशवाहकों के रूप में कार्य करें तथा रिमांड आवेदनों को नियमित तरीके से अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।’’
न्यायमूर्ति बी. आर. गवई और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने आठ दिसंबर, 2023 को तुषारभाई रजनीकांत भाई शाह को अग्रिम जमानत प्रदान की थी।
पीठ ने इस बात से हैरानगी जताई कि उसके आदेश के लागू होने के बावजूद एक न्यायिक अधिकारी ने जांच अधिकारी (आईओ) की याचिका पर गौर किया और आरोपी को पूछताछ के लिए पुलिस हिरासत में भेज दिया।
पीठ ने कहा, ‘‘अवमाननाकर्ता प्रतिवादी संख्या सात (दीपाबेन संजयकुमार ठाकर, छठीं अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, सूरत) द्वारा याचिकाकर्ता को पुलिस हिरासत में भेजने और इसकी अवधि पूरी होने पर उसे रिहा न करने की कार्रवाई स्पष्ट रूप से इस अदालत के आदेश के विरुद्ध है...और अवमानना के समान है।’’
न्यायालय ने कहा, ‘‘अवमाननाकर्ता-प्रतिवादी (न्यायाधीश) की अवज्ञाकारी कार्रवाई भी, पुलिस रिमांड की अवधि समाप्त होने के बाद याचिकाकर्ता को लगभग 48 घंटे तक अवैध हिरासत में रखने के लिए जिम्मेदार है।’’
इसने कहा कि न्यायिक अधिकारी के आचरण से इस मामले में उनके पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण का स्पष्ट संकेत मिलता है।
सूरत के वेसु पुलिस थाने के पुलिस निरीक्षक आर वाई रावल की भूमिका पर विस्तार से चर्चा करते हुए, न्यायालय ने कहा कि आरोपी को दिये गए अंतरिम संरक्षण के दौरान उसकी पुलिस हिरासत के लिए अर्जी ‘‘इस अदालत के आदेश की घोर अवहेलना’’ है और ‘‘अवमानना के समान’’ है।
पीठ ने उन्हें पिछले वर्ष आठ दिसंबर के आदेश की अवमानना करने का दोषी ठहराया।
न्यायमूर्ति गवई ने 73 पृष्ठों का फैसला लिखते हुए कहा कि उच्चतम न्यायालय के आदेश से इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाता कि अग्रिम जमानत का अंतरिम संरक्षण ‘‘पूर्ण है, जब तक कि वह इस याचिका पर निर्णय करते समय इसमें संशोधन या परिवर्तन नहीं करता’’ जो अभी भी लंबित है।
अधीनस्थ न्यायालय की न्यायाधीश की बिना शर्त माफी को स्वीकार करने से इनकार करते हुए न्यायालय ने कहा कि उन्होंने मामले को ‘‘पूर्वनिर्धारित तरीके’’ से निपटाया है।
पीठ ने हालांकि, सूरत पुलिस आयुक्त को अवमानना के आरोपों से मुक्त करते हुए कहा कि उनकी भूमिका हिरासत में यातना संबंधी आरोपी के दावे का पता लगाने के लिए पुलिस थाने में लगाए गए सीसीटीवी कैमरों के काम न करने के पहलू तक ही सीमित थी।
भाषा देवेंद्र