उच्चतम न्यायालय बाल विवाह के संबंध में एनसीपीसीआर की याचिका पर सुनवाई करेगा
आशीष पवनेश
- 06 Aug 2024, 06:54 PM
- Updated: 06:54 PM
नयी दिल्ली, छह अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) की उस याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर मंगलवार को सहमति जताई जिसमें इस जटिल कानूनी सवाल को उठाया गया है कि क्या बाल विवाह निषेध संबंधी धर्मनिरपेक्ष कानून मुस्लिम पर्सनल लॉ पर प्रभावी होगा।
प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अनुरोध किया कि बाल विवाह के मुद्दे पर विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा सुनाए गए अलग-अलग फैसलों को ध्यान में रखते हुए एनसीपीसीआर की याचिका पर प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई की जाए।
मेहता ने कहा कि कुछ उच्च न्यायालय इस मुद्दे पर पर्सनल लॉ का संज्ञान ले रहे हैं और परस्पर विरोधी निर्णय दिए जा रहे हैं, जिसके कारण शीर्ष अदालत में कई विशेष अनुमति याचिकाएं (एसएलपी) दायर की जा सकती हैं।
सॉलिसिटर जनरल ने कहा, ‘‘विभिन्न उच्च न्यायालयों द्वारा अलग-अलग विचार रखे जा रहे हैं। मुद्दा यह है कि एक धर्म या दूसरे धर्म में बाल विवाह की अनुमति है या नहीं। हम (एनसीपीसीआर) संवैधानिक सिद्धांतों पर बहस कर रहे हैं।’’
उन्होंने पीठ से आग्रह किया कि एनसीपीसीआर की 2022 याचिका को ‘‘किसी भी बुधवार या बृहस्पतिवार’’ को सूचीबद्ध किया जाए क्योंकि विभिन्न उच्च न्यायालयों के नए फैसले सुनाए जा रहे हैं और अपील की संख्या बढ़ रही है।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘हमें मामले का तुरंत निपटाना होगा’’ और याचिका को जल्द सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई।
एनसीपीसीआर की याचिका मंगलवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध थी और कराधान विवाद से संबंधित कुछ याचिकाओं पर कार्यवाही के कारण इस पर सुनवाई होने की संभावना नहीं थी।
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने 2022 में ‘जावेद बनाम हरियाणा राज्य’ मामले में दिए गए अपने फैसले में कहा था कि एक मुस्लिम लड़की, यौनिकता प्राप्त करने के बाद वैध विवाह कर सकती है, इस तथ्य के बावजूद कि वह प्रासंगिक धर्मनिरपेक्ष कानूनों के तहत वयस्क नहीं हुई है।
शीर्ष अदालत ने एनसीपीसीआर की याचिका पर नोटिस जारी करते हुए स्पष्ट किया था कि पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के फैसले को अन्य मामलों में मिसाल के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए।
बाद में, केरल उच्च न्यायालय ने एक विपरीत दृष्टिकोण अपनाया और कहा कि पर्सनल लॉ के तहत मुसलमानों के बीच विवाह को यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पोक्सो) अधिनियम से बाहर नहीं रखा गया है और व्यक्ति पर इसके तहत नाबालिग के यौन शोषण के अपराध के लिए मुकदमा चलाया जा सकता है।
भाषा आशीष