मालीवाल मामले में कानून के मुताबिक बिभव कुमार की गिरफ्तारी आवश्यक थी: दिल्ली उच्च न्यायालय
आशीष माधव
- 03 Aug 2024, 08:47 PM
- Updated: 08:47 PM
नयी दिल्ली, तीन अगस्त (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि आम आदमी पार्टी (आप) की सांसद स्वाति मालीवाल पर कथित हमले से संबंधित मामले में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के करीबी सहयोगी बिभव कुमार की गिरफ्तारी ‘‘आवश्यक’’ थी और ऐसा करते समय पुलिस ने कानून का कड़ाई से पालन किया।
अदालत ने कुमार की याचिका खारिज करते हुए फैसले में कहा है कि उनकी याचिका में कोई दम नहीं है। कुमार की याचिका में दावा किया गया था कि उनकी गिरफ्तारी अवैध थी।
फिलहाल न्यायिक हिरासत में बंद कुमार ने 13 मई को केजरीवाल के सरकारी आवास पर मालीवाल पर कथित तौर पर हमला किया था। उन्हें 18 मई को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था।
अपनी याचिका में कुमार ने गिरफ्तारी को अवैध और दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 41ए (पुलिस अधिकारी के समक्ष पेश होने का नोटिस) के प्रावधानों का घोर उल्लंघन तथा कानून के विरुद्ध घोषित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया था।
न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने शनिवार को सुनाए फैसले में कहा कि गिरफ्तारी के बाद निचली अदालत ने पांच दिन की पुलिस हिरासत की अनुमति देने से पहले कुमार के साथ-साथ सरकार का भी पक्ष सुना था। न्यायाधीश ने यह भी कहा कि कानून जांच अधिकारी को जांच के दौरान किसी व्यक्ति को गिरफ्तार न करने का विवेकाधिकार देता है, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में ‘‘आरोपी याचिकाकर्ता को बिना नोटिस दिए गिरफ्तार करने के पर्याप्त आधार मौजूद हैं।’’
अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 में व्यक्ति को ‘‘स्वतंत्रता का अधिकार’’ प्राप्त है और कानून को यह सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है कि कानूनी प्रक्रिया के अलावा ऐसी स्वतंत्रता का उल्लंघन न हो।
अदालत ने कहा, ‘‘तथ्यों से स्पष्ट रूप से यह स्थापित होता है कि बताई गई परिस्थितियों में गिरफ्तारी आवश्यक थी और यह सीआरपीसी, 1973 की धारा 41 के सख्त अनुपालन में सिद्धांतों, दिशानिर्देशों का पालन करते हुए की गई...इसलिए मौजूदा याचिका में कोई दम नहीं है, जिसे खारिज किया जाता है।’’
अदालत ने कहा कि पुलिस के अनुसार, सीसीटीवी फुटेज ‘ब्लैंक’ पाई गई और पूछताछ के दौरान कुमार ने सहयोग नहीं किया।
अदालत ने कहा कि कुमार की जमानत याचिका खारिज करते हुए उच्च न्यायालय की एक अन्य पीठ ने भी ‘‘महत्वपूर्ण साक्ष्यों को छिपाने’’ का उल्लेख किया था, क्योंकि केवल ‘‘चुनिंदा सीसीटीवी फुटेज ही सौंपी गई थी और आरोपी द्वारा मोबाइल फोन को ‘‘फिर से फॉर्मेट किया गया था।’’ अदालत ने कहा कि यह महत्वपूर्ण साक्ष्यों को छिपाने के प्रयास को दर्शाता है, क्योंकि कथित तौर पर शिकायतकर्ता स्वाति मालीवाल ने मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंचने पर व्हाट्सएप के माध्यम से याचिकाकर्ता को संदेश भेजा था।
अदालत ने कहा कि गिरफ्तारी के बाद कुमार को रिमांड आवेदन की एक प्रति निचली अदालत में उपलब्ध करा दी गई थी, जिस पर उन्होंने जवाब भी दाखिल कर दिया था और उनका आपराधिक इतिहास भी है, क्योंकि उत्तर प्रदेश के नोएडा में उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला लंबित है।
कुमार के खिलाफ 16 मई को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी, जिसमें महिला को निर्वस्त्र करने के इरादे से हमला, आपराधिक धमकी या आपराधिक बल का प्रयोग, तथा गैर इरादतन हत्या का प्रयास शामिल है।
कुमार की जमानत याचिका पहले निचली अदालत और उच्च न्यायालय द्वारा खारिज कर दी गई थी और यह मामला उच्चतम न्यायालय में लंबित है।
भाषा आशीष