न्यायालय ने आपराधिक मुकदमों में 'राजनीतिक प्रभाव' पर चिंता जताई
नोमान वैभव
- 17 Jul 2024, 08:30 PM
- Updated: 08:30 PM
नयी दिल्ली, 17 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने उत्तर प्रदेश से बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के पूर्व विधायक छोटे सिंह के खिलाफ दोहरे हत्याकांड के तीन दशक पुराने मामले को फिर से शुरू करते हुए कहा कि देश की न्यायिक प्रणाली अक्सर खुद को लंबे विलंब और संदिग्ध राजनीतिक प्रभाव के व्यापक मुद्दों से जूझते हुए पाती है।
न्यायमूर्ति विक्रमनाथ और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा, “हम यह भी स्वीकार करते हैं कि 19 मई 2012 के निचली अदालत के आदेश से यह स्पष्ट है कि आरोपी छोटे सिंह के खिलाफ मुकदमा वापस लेने के लिए राजनीतिक शक्ति का इस्तेमाल किया गया है।”
पीठ ने कहा कि 19 मई 2012 के आदेश को आरोपियों और पीड़ितों दोनों ने चुनौती दी थी, लेकिन मामला 12 वर्षों से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में लंबित है, जिससे मुकदमे की कार्यवाही में रुकावट आ गई, जो “बेहद परेशान करने वाली बात” है।
पीठ ने कहा, “हमारे देश की न्यायिक प्रणाली अक्सर कानूनी कार्यवाही में लंबे विलंब और संदिग्ध राजनीतिक प्रभाव के व्यापक मुद्दों से जूझती रहती है। वर्तमान मामला उस खतरनाक प्रवृत्ति को उजागर करता है, जहां मामलों, विशेष रूप से प्रभावशाली व्यक्तियों से जुड़े मामलों में, काफी देरी होती है, जिससे न्याय प्रदान में बाधा उत्पन्न होती है। शक्तिशाली व्यक्तियों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला अनुचित प्रभाव स्थिति को और भी बदतर बना देता है, जिससे निष्पक्षता को लेकर चिंताएं बढ़ जाती हैं।”
पीठ ने कहा कि यह मामला चिंताजनक परिस्थितियों को प्रस्तुत करता है, जिसमें दिनदहाड़े दोहरे हत्याकांड के आरोपी राजनीतिक रूप से प्रभावशाली व्यक्ति लगभग तीन दशकों से मुकदमे से बचते रहे हैं।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री, आरोपी छोटे सिंह का राजनीतिक प्रभाव तथा उसके खिलाफ मुकदमा वापस लेने की अनुमति देने में निचली अदालत के लापरवाह रुख पर विचार करते हुए इस अदालत की राय है कि केवल आरोपी व्यक्ति का विधानसभा के लिए चुना जाना आम जनता में उसकी छवि का प्रमाण नहीं हो सकता है।
पीठ ने कहा, “उपर्युक्त चर्चा के आलोक में, हम आरोपी छोटे सिंह के खिलाफ मुकदमा वापस लेने के फैसले को खारिज करने के पक्ष में हैं।”
शीर्ष अदालत ने कहा कि दोहरे हत्याकांड जैसे जघन्य अपराध के मामलों में केवल इस आधार पर अभियोजन वापस नहीं लिया जाता कि पूरी जांच के बाद आरोपपत्र में नामजद आरोपी की सार्वजनिक छवि अच्छी है।
उच्चतम न्यायालय ने 15 जुलाई के आदेश में कहा कि जनहित में इस तरह से मुकदमा वापसी की अनुमति नहीं दी जा सकती और इस तर्क को स्वीकार नहीं किया जा सकता, खासकर प्रभावशाली लोगों की संलिप्तता वाले मामलों में।
पीठ ने मामले से निपटने में उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण की भी आलोचना की।
सिंह पर नौ अन्य लोगों के साथ मिलकर 30 मई 1994 को राजकुमार और जगदीश शरण पर अंधाधुंध गोलीबारी करने का आरोप है। बाद में दोनों की मृत्यु हो गई थी।
मुकदमा लंबित रहने के दौरान ही सिंह 2007 में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के टिकट पर उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य चुने गए थे।
वर्ष 2007 में उत्तर प्रदेश में सत्ता में आई बसपा ने 2008 में सिंह और अन्य के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 321 के तहत मुकदमा वापस लेने का निर्णय लिया था।
साल 2012 में निचली अदालत ने सिंह के पक्ष में अभियोजन वापसी के आवेदन पर निर्णय दिया था, जिसमें कहा गया था कि जनता के बीच उनकी छवि अच्छी है और वह समाज के एक सम्मानित नागरिक हैं।
अन्य आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने के आवेदन खारिज कर दिए गए। 2012 के आदेश को उन आरोपियों ने उच्च न्यायालय में चुनौती दी जिनके खिलाफ मुकदमा जारी रहा और साथ ही एक पीड़ित की विधवा ने भी इसे चुनौती दी थी।
शीर्ष अदालत ने कहा कि तब से यह मामला उच्च न्यायालय में लंबित है।
भाषा नोमान