पीएमएलए मामले में गिरफ्तारी के लिए ‘विश्वास योग्य कारण’ मुहैया कराया जाना चाहिए: न्यायालय
अमित सुरेश
- 12 Jul 2024, 10:39 PM
- Updated: 10:39 PM
नयी दिल्ली, 12 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि धनशोधन निवारण अधिनियम के तहत किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी के लिए उसे ‘‘विश्वास योग्य कारण’’ बताना जरूरी है, ताकि गिरफ्तार व्यक्ति अपनी हिरासत को चुनौती दे सके।
न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता की पीठ ने कथित आबकारी नीति घोटाले से जुड़े धनशोधन मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अंतरिम जमानत प्रदान की। पीठ ने कहा कि पीएमएलए के तहत गिरफ्तारी का अधिकार देने वाली धारा 19 व्यक्तियों के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कड़े सुरक्षा उपाय भी प्रदान करती है।
पीठ ने अपने 64-पृष्ठ के फैसले में कहा, "हम व्यक्तिगत स्वतंत्रता के उल्लंघन और कानून के अनुसार गिरफ्तारी करने की शक्ति के प्रयोग से चिंतित हैं। गिरफ्तारी की कार्रवाई की पड़ताल न्यायिक समीक्षा के अधीन है, भले ही वह (गिरफ्तारी) कानून के अनुसार क्यों न हुई हो।’’
पीठ ने कहा, "इसका अर्थ है कि गिरफ्तार व्यक्ति को 'विश्वास योग्य कारण' प्रदान किए जाने चाहिए, ताकि वह गिरफ्तारी की वैधता को चुनौती देने के अपने अधिकार का प्रयोग कर सके।"
पीठ ने कहा कि धारा 19(1) के तहत गिरफ्तार करने की शक्ति जांच के उद्देश्य से नहीं है।
उसने कहा, "गिरफ्तारी रोकी जा सकती है और रोकी जानी भी चाहिए और पीएमएलए की धारा 19(1) के अनुसार शक्ति का प्रयोग तभी किया जा सकता है जब निर्दिष्ट अधिकारी के पास मौजूद सामग्री उन्हें लिखित रूप में कारण दर्ज करके यह राय बनाने में सक्षम बनाती है कि गिरफ्तार किये जाने वाला व्यक्ति दोषी है।"
पीएमएलए की धारा 45 का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि प्रावधान जमानत देने के मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की राय को प्राथमिकता देता है। यह धारा जमानत की शर्तों से संबंधित है।
उसने कहा, "डीओई (प्रवर्तन निदेशालय) को एक समान, सुसंगत तरीके से कार्य करना चाहिए, आचरण में सुसंगत होना चाहिए, सभी के लिए एक नियम की पुष्टि करनी चाहिए।’’
इसने कहा कि पीएमएलए की धारा 19 के तहत अंतर्निहित उपाय यह कहती है कि नामित अधिकारियों को "विश्वास योग्य कारण" दर्ज करने होंगे। पीठ ने कहा कि दूसरी ओर गिरफ्तारी के वक्त गिरफ्तार व्यक्ति को कारण बताए जाने चाहिए और अंत में, कब्जे में मौजूद सामग्री के साथ गिरफ्तारी के आदेश की एक प्रति न्यायाधिकरण की सुरक्षित अभिरक्षा में भेजनी होगी।
उसने कहा, "यह गिरफ्तार व्यक्ति की धनशोधन के अपराध में संलिप्तता के बारे में अपनी राय बनाते समय नामित अधिकारी की निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है।"
पीठ ने कहा कि यह कहना गलत नहीं तो असंगत होगा कि आरोपी को "विश्वास करने के कारणों" की प्रति देने से मना किया जा सकता है। वास्तव में, यह प्रभावी रूप से आरोपी को अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देने और "विश्वास योग्य कारणों" पर सवाल उठाने से रोकेगा।’’
हालांकि, इसने स्वीकार किया कि एक बार के मामले में, जब जांच चल रही हो, तो ईडी के लिए गवाहों के नाम और दस्तावेजों के विवरण सहित सभी सामग्री का खुलासा करना संभव नहीं हो सकता है।
ईडी द्वारा किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी की पड़ताल करते समय अदालत द्वारा न्यायिक समीक्षा के मुद्दे का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि यदि जांच एजेंसी द्वारा पर्याप्त और उचित सावधानी बरती जाती है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि पीएमएलए की धारा 19(1) के अनुसार गिरफ्तारी को उचित ठहराने के लिए "विश्वास योग्य कारण" उचित हैं, तो न्यायिक समीक्षा की शक्ति का प्रयोग चिंता का विषय नहीं होगा।
इसने कहा कि संदेह तभी उत्पन्न होगा जब प्राधिकारी द्वारा दर्ज किए गए कारण स्पष्ट और सुस्पष्ट नहीं हों और इसलिए, गहन पड़ताल की आवश्यकता होगी।
भाषा अमित