मालीवाल से मारपीट मामला : दिल्ली उच्च न्यायालय ने बिभव को जमानत देने से किया इनकार
धीरज सुरेश
- 12 Jul 2024, 08:59 PM
- Updated: 08:59 PM
नयी दिल्ली, 12 जुलाई (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने आम आदमी पार्टी (आप) की राज्यसभा सदस्य स्वाती मालीवाल से मारपीट करने के मामले में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सहयोगी बिभव कुमार को शुक्रवार को जमानत देने से मना कर दिया।
न्यायमूर्ति अनूप कुमार मेंदीरत्ता ने कुमार की जमानत अर्जी खारिज करते हुए कहा कि वह ‘काफी प्रभावी’ व्यक्ति हैं और उन्हें राहत देने के लिए कोई उचित आधार नहीं बनता।
न्यायाधीश ने कहा कि इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है कि याचिकाकर्ता को जमानत पर रिहा करने से वह गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं या सबूतों से छेड़छाड़ कर सकते हैं।
अदालत ने कहा कि आरोपों की प्रकृति और गवाहों को प्रभावित करने की आशंका को देखते हुए इस स्तर पर याचिकाकर्ता को जमानत पर रिहा करने का कोई आधार नहीं बनता। न्यायाधीश ने फैसला दिया, ‘‘तदनुसार अर्जी खारिज की जाती है।’’
कुमार इस समय न्यायिक हिरासत में हैं। उनपर 13 मई को केजरीवाल के आधिकारिक आवास में मालीवाल से मारपीट करने का आरोप है। उन्हें 18 मई को गिरफ्तार किया गया था।
कुमार के खिलाफ 16 मई को आपराधिक धमकी देने, महिला पर हमला करने या उसका चीरहरण करने की मंशा से आपराधिक बल का प्रयोग, गैर-इरादतन हत्या की कोशिश सहित तत्कालीन भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी। कुमार ने जमानत देने का अनुरोध करते हुए दावा किया था कि उनके खिलाफ झूठे आरोप हैं और मामले की जांच पूरी हो गई है, इसलिए उन्हें अब हिरासत में रखने की आवश्यकता नहीं है।
अदालत ने आठ पन्ने के आदेश में कहा कि मौजूदा सांसद द्वारा मुख्यमंत्री आवास में मारपीट के लगाए गए आरोप पर केवल इसलिए अविश्वास नहीं किया जा सकता कि प्राथमिकी दर्ज कराने में देरी हुई है, क्योंकि उसके बाद की घटनाओं से ‘‘प्रतिबिंबित होता है कि शिकायतकर्ता बिना उकसावे के हुए हमले का सामना करने के बाद बदहवास थी।’’
अदालत ने कहा कि यह अनुमान लगाना ‘‘बेतुका’’ हो सकता है कि आरोपी को झूठा फंसाया गया है, ‘‘क्योंकि स्पष्ट रूप से शिकायतकर्ता के पास याचिकाकर्ता को फंसाने का कोई मकसद नहीं था।’’
अदालत ने कहा, ‘‘अगर ऐसी कोई घटना नहीं हुई होती तो शिकायतकर्ता ने हमले के दौरान खुद 112 पर कॉल नहीं की होती। प्राथमिकी में दर्ज हमले के दौरान याचिकाकर्ता (कुमार) द्वारा कही गई बातें दर्शाती हैं कि इसमें कोई गहरी साजिश या मकसद था। चूंकि शिकायतकर्ता खुद एक राजनीतिक दल की प्रतिष्ठित सदस्य हैं, इसलिए याचिकाकर्ता की शक्तिशाली स्थिति को देखते हुए उन्होंने शिकायत दर्ज कराने के बारे में दोबारा सोचा।’’
फैसले में कहा, ‘‘विशिष्ट तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए इस स्तर पर यह अनुमान लगाना बेतुका हो सकता है कि याचिकाकर्ता को झूठा फंसाया गया है और आरोप मनगढ़ंत हैं, क्योंकि स्पष्ट रूप से शिकायतकर्ता के पास याचिकाकर्ता को फंसाने का कोई मकसद नहीं था।’’
अदालत ने पुलिस की उस दलील को भी रिकॉर्ड पर लिया कि अहम सबूतों को दबाने की कोशिश की गई, क्योंकि मुख्यमंत्री आवास में लगे सीसीटीवी में रिकॉर्ड फुटेज के चुनिंदा हिस्से ही जांच के दौरान उपलब्ध कराये गये।
अदालत ने टिप्पणी की, ‘‘मुख्यमंत्री आवास में तैनात सहायक अनुभाग अधिकारी दीपक दीक्षित द्वारा 13 मई 2024 को अनुभाग अधिकारी को भेजी गई रिपोर्ट की अब भी जांच की जानी है, क्योंकि उसे पुलिस को अबतक सौंपा नहीं गया है। सामान्यत: ऐसी किसी गंभीर सुरक्षा चूक की रिपोर्ट तत्काल वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा दिल्ली पुलिस के अधिकारियों को जरूरी कार्रवाई के लिए भेजी जाती है।’’
अदालत ने अपने आदेश में कहा, ‘‘यह भी एक तथ्य है कि जिस मोबाइल फोन को याचिकाकर्ता से जब्त किया गया था, उसमें दर्ज जानकारी जब्ती से पहले हटा दी गई। यह दिखाता है कि कुछ अहम सबूत छिपाने की कोशिश की गई, क्योंकि कथित तौर पर मुख्यमंत्री कार्यालय पहुंचने का संदेश शिकायतकर्ता द्वारा व्हाट्सऐप के जरिये याचिकाकर्ता को दी गयी थी।’’
दिल्ली पुलिस ने जमानत अर्जी का विरोध करते हुए कहा कि उन्हें रिहा करने पर जांच प्रभावित हो सकती है। उसने अदालत को बताया कि जांच चल रही है और 16 जुलाई या इससे पहले आरोप-पत्र दाखिल कर दिया जाएगा।
भाषा धीरज