उच्च न्यायालय ने रोडरेज मामले में न्यायिक अधिकारी के आचरण पर जतायी नाराजगी
नरेश
- 30 Jul 2026, 02:45 PM
- Updated: 02:45 PM
बेंगलुरु, 30 जुलाई (भाषा) कर्नाटक उच्च न्यायालय ने कथित रोड रेज की घटना में एक न्यायिक अधिकारी के आचरण पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा कि सीसीटीवी फुटेज से प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि उनका व्यवहार ''न्यायपालिका के सदस्य के पद की गरिमा के सर्वथा प्रतिकूल'' था।
अदालत ने इस आरोप पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की कि न्यायिक अधिकारी ने अपने आधिकारिक पद का कथित तौर पर इस्तेमाल कर नागरिकों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करायी।
न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना ने बुधवार को आरोपियों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान घटना का सीसीटीवी फुटेज देखा। फुटेज में कथित तौर पर मलूर की प्रधान सिविल न्यायाधीश एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी गायत्री और उनके पति उनकी निजी कार से आगे निकलने की होड़ करने वाले दोपहिया वाहन सवारों के साथ बहस करते दिखाई दे रहे हैं।
अदालत के अनुसार, शिकायतकर्ता न्यायिक अधिकारी अपने पति के साथ निजी कार से यात्रा कर रही थीं। इसी दौरान आरोपी संख्या-1 और 2 ने उनकी कार से आगे निकलने का प्रयास किया, जो दोपहिया वाहन पर सवार थे।
न्यायमूर्ति नागप्रसन्ना ने कहा, ''ऐसा प्रतीत होता है कि न्यायिक अधिकारी या उनके पति के अहं को ठेस पहुंची। इसके बाद वे अपनी कार से दोपहिया वाहन का पीछा करते हैं, उसे रुकवाते हैं और नीचे उतरकर उनसे बहस करने लगते हैं। यह पूरी बहस सीसीटीवी में रिकॉर्ड हुई है। इस अदालत ने वह फुटेज देखा है, जिसमें न्यायिक अधिकारी और उनके पति झगड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं।''
राज्य के लोक अभियोजक (एसपीपी) ने अदालत को बताया कि दोपहिया वाहन पर केवल दो आरोपी ही सवार थे। हालांकि, न्यायिक अधिकारी के कहने पर 70 वर्षीय एक व्यक्ति को भी हिरासत में ले लिया गया, जिसे तीसरा आरोपी बनाया गया।
अदालत ने अपने आदेश में कहा, ''यह आश्चर्यजनक है कि इन याचिकाकर्ताओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में उन्हें केवल इसलिए हिरासत में ले लिया गया क्योंकि शिकायतकर्ता एक न्यायिक अधिकारी थीं। इसका यह अर्थ नहीं है कि किसी न्यायिक अधिकारी के निर्देश पर नागरिकों के साथ इस प्रकार का व्यवहार किया जाए।''
अदालत ने कहा कि वीडियो, अथवा वह वीडियो जो अब सोशल मीडिया पर प्रसारित हो रहा है, स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि न्यायिक अधिकारी का आचरण उनके पद की गरिमा के ''पूरी तरह प्रतिकूल'' था।
न्यायमूर्ति नागप्रसन्ना ने कहा कि न्यायाधीश या न्यायिक अधिकारी का पद ऐसा नहीं है जिसे केवल अदालत कक्ष की चारदीवारी के भीतर धारण किया जाए और उसके बाहर आते ही छोड़ दिया जाए। उन्होंने कहा कि न्यायिक पद एक निरंतर सार्वजनिक विश्वास का दायित्व है और अदालत के बाहर न्यायिक अधिकारी का आचरण न्यायपालिका में जनता के विश्वास को या तो कमजोर कर सकता है या उसे मजबूत बना सकता है।
अदालत ने कहा, ''यदि वीडियो देखा जाए तो प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि केवल इसलिए कि एक सामान्य व्यक्ति ने न्यायिक अधिकारी की कार से आगे निकलने की कोशिश की, उसके बाद न्यायिक अधिकारी का कार से उतरकर उससे झगड़ना उनके पद की गरिमा के सर्वथा प्रतिकूल है।''
अदालत ने यह भी कहा, ''न्यायिक अधिकारी के पद के दुरुपयोग का इससे अधिक स्पष्ट और प्रत्यक्ष उदाहरण शायद ही कोई हो सकता है।''
उच्च न्यायालय ने अंतरिम आदेश पारित करते हुए याचिकाकर्ताओं के खिलाफ आगे की कार्यवाही और जांच पर रोक लगा दी। साथ ही, रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह इस आदेश को संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई के लिए मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करे।
भाषा गोला नरेश
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