लिफ्ट हादसे में मौत पर रॉ अधिकारी के परिवार को तीन करोड़ रुपये से अधिक मुआवजा देने का फैसला बरकरार
नेत्रपाल
- 29 Jul 2026, 09:37 PM
- Updated: 09:37 PM
नयी दिल्ली, 29 जुलाई (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि सुरक्षा एक बुनियादी गारंटी है जो हर लिफ्ट में होनी चाहिए। न्यायालय ने वर्ष 2003 में लिफ्ट दुर्घटना में जान गंवाने वाले रॉ अधिकारी के परिवार को 3.01 करोड़ रुपये से अधिक का मुआवजा प्रदान करने के फैसले को सही ठहराया।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) के आदेश को बरकरार रखते हुए 'ओटिस एलिवेटर कंपनी (इंडिया) लिमिटेड' की अपील खारिज कर दी।
शीर्ष अदालत ने एनसीडीआरसी के इस निष्कर्ष में दखल देने से इनकार कर दिया कि सेवा में कमी के लिए मुख्य रूप से ओटिस जिम्मेदार थी।
पीठ ने कहा, ''जो पार्टी किसी ऐसी मशीन की पूरी देखरेख का काम लेती है, उसकी उपयोगकर्ता के प्रति अधिक सावधानी बरतने की जिम्मेदारी होती है। ओटिस उस खराबी से अनजान नहीं थी जिसके कारण दुर्घटना हुई।''
इसने कहा, ''उसे समस्या की जानकारी थी और उसने खुद ही इसके समाधान का सुझाव दिया था। ऐसा करने के बाद यह पक्का न कर पाना कि समाधान लागू किया गया है, या फिर समाधान लागू होने तक लिफ्ट को दूसरे तरीकों से सुरक्षित न बनाना, सेवा में कमी माना जाएगा।''
एनसीडीआरसी ने ओटिस, रॉ और मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज (एमईएस) को विपिन हांडा (46) के परिवार को मुआवजा प्रदान करने का निर्देश दिया था।
हांडा 'रिसर्च एंड एनालिसिस विंग' (रॉ) के निदेशक थे।
बीस मार्च, 2003 को दिल्ली के लोधी रोड स्थित रॉ कार्यालय में एक बैठक खत्म करने के बाद हांडा 12 अन्य अधिकारियों के साथ लिफ्ट में थे, तभी वह सातवीं और छठी मंजिल के बीच फंस गई। हांडा से ठीक पहले एक व्यक्ति को बचाया गया, जबकि बाकी लोग लिफ्ट से तब बाहर निकल पाए जब वह छठी मंजिल पर खुली।
वर्ष 2005 में उनकी पत्नी रश्मि हांडा और उनके दो बच्चों सृष्टि तथा क्षितिज ने एनसीडीआरसी में शिकायत दर्ज कराई।
मामले में एक तकनीकी समिति ने यह नतीजा निकाला कि वोल्टेज में उतार-चढ़ाव की वजह से लिफ्ट रुक गई थी। इसके साथ ही समिति ने कहा कि जब हांडा को बाहर निकालने की कोशिश की जा रही थी, तो कोई 11वीं मंजिल पर बने मशीन रूम में घुस गया और 'ब्रेक रिलीज की' (चाबी) से लिफ्ट के ब्रेक खोल दिए।
इससे लिफ्ट नीचे की ओर चलने लगी।
आयोग ने यह नतीजा निकाला कि 'ब्रेक रिलीज की' से ब्रेक खोलना ही इस हादसे की एकमात्र वजह थी और यह इंसानी गलती या ऐसी वजह से हुआ जिसमें कोई शक की गुंजाइश नहीं है।
इस मामले पर टिप्पणी करते हुए शीर्ष अदालत ने एनसीडीआरसी के इस निष्कर्ष से सहमति जताई कि रॉ और एमईएस की जवाबदेही ओटिस की तुलना में कम है।
पीठ ने कहा, ''इसकी कमी का संबंध दुर्घटना के लिए किसी सीधी भूमिका के बजाय निगरानी में हुई चूक से अधिक है... हमारी राय में, ओटिस पर 70 प्रतिशत, एमईएस पर 25 प्रतिशत और रॉ पर पांच प्रतिशत जिम्मेदारी तय करना, दुर्घटना के प्रति हर पक्ष की जानकारी, नियंत्रण और जिम्मेदारी के अलग-अलग स्तर को सही ढंग से दिखाता है, और मामले में इस न्यायालय के दखल की कोई जरूरत नहीं है।''
भाषा संतोष नेत्रपाल
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