उच्चतम न्यायालय में अभद्र भाषा के प्रयोग के आरोप में गिरफ्तार दो विधि छात्रों को जमानत मिली
वैभव
- 29 Jul 2026, 11:58 AM
- Updated: 11:58 AM
नयी दिल्ली, 29 जुलाई (भाषा) दिल्ली की एक अदालत ने उच्चतम न्यायालय में सुनवाई के दौरान कथित रूप से अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने, सुरक्षाकर्मी से हाथापाई करने और न्यायिक कार्यवाही में बाधा डालने के आरोप में गिरफ्तार विधि के दो छात्रों को जमानत दे दी है।
अदालत ने कहा कि उच्चतम न्यायालय जैसी प्रतिष्ठित संस्था की महत्ता और मजबूती किसी एक आक्रोशित याचिकाकर्ता के असंयमित व्यवहार से कमजोर नहीं पड़ती, जो बिना वकील के स्वयं पैरवी कर रहा हो। हालांकि, न्यायिक मजिस्ट्रेट रवि ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि इस तरह का आचरण किसी भी तरह स्वीकार्य नहीं है और इसकी स्पष्ट रूप से निंदा की जाती है।
अदालत उत्तर प्रदेश के इटावा निवासी और लखनऊ विश्वविद्यालय के तीसरे वर्ष के विधि छात्र प्रबल प्रताप सिंह (24) तथा रायबरेली निवासी दूसरे वर्ष के विधि छात्र चंदर भान (23) की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। प्रबल प्रताप इस मामले में स्वयं याचिकाकर्ता के रूप में अदालत में पेश हुआ था।
पुलिस के अनुसार, यह घटना 10 जुलाई को उच्चतम न्यायालय के अदालत कक्ष नंबर-13 में प्रबल प्रताप एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मामले में विशेष अनुमति याचिका की सुनवाई के दौरान हुई थी।
पुलिस का आरोप है कि सुनवाई के दौरान प्रबल प्रताप ने अभद्र और असंसदीय भाषा का इस्तेमाल किया, अदालत कक्ष में कागज़ फेंके, हंगामा किया और सुरक्षा कर्मियों के साथ बल प्रयोग किया।
अदालत ने 27 जुलाई के अपने आदेश में कहा कि आरोपों से सर्वोच्च संवैधानिक अदालत की गरिमा और मर्यादा प्रभावित होने वाला आचरण सामने आता है।
अदालत ने कहा, ''कोई भी याचिकाकर्ता, चाहे वह अपने मामले के परिणाम से कितना भी असंतुष्ट क्यों न हो या स्वयं अपनी पैरवी कर रहा हो, उसे अदालत में कागज फेंकने या पीठासीन न्यायाधीश अथवा भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) के पद के प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग करने का अधिकार नहीं मिल जाता।''
मजिस्ट्रेट ने कहा कि यदि ऐसे व्यवहार पर कोई टिप्पणी न की जाए, तो यह संदेश जा सकता है कि इसे मौन स्वीकृति प्राप्त है, इसलिए यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ऐसा आचरण अस्वीकार्य है और इसकी कड़ी निंदा की जाती है।
उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में दोनों आरोपी किसी भी अदालत में न्यायिक प्रक्रिया के अनुरूप आवश्यक संयम और शालीनता बनाए रखेंगे।
हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय ने स्वयं इस मामले को अत्यंत संयम और धैर्य के साथ देखा। दस जुलाई को शीर्ष अदालत की पीठ ने यह दर्ज किया था कि याचिकाकर्ता ने असंगत और असंसदीय टिप्पणियां की थीं, लेकिन उसके विरुद्ध कोई कार्रवाई करने का प्रस्ताव नहीं रखा।
मजिस्ट्रेट ने कहा, ''उच्चतम न्यायालय जैसी संस्था किसी एक व्यक्ति के असंयमित व्यवहार से प्रभावित नहीं होती। इसलिए जमानत पर विचार करते समय अधीनस्थ अदालतों को भी वही संस्थागत संयम और संतुलन अपनाना चाहिए, जिसका परिचय स्वयं उच्चतम न्यायालय ने दिया है।''
अदालत ने कहा कि सरकारी कर्मचारी पर हमला करने और सरकारी कार्य में बाधा डालने जैसे आरोपों में अधिकतम दो वर्ष की सजा का प्रावधान है। दिल्ली पुलिस अपनी जांच पूरी कर चुकी है और अब किसी अतिरिक्त बरामदगी या पुलिस हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता नहीं है।
अदालत ने दोनों आरोपियों को 25,000 रुपये के निजी मुचलके और इतनी ही राशि के जमानती मुचलके पर रिहा करने का आदेश दिया। साथ ही शर्त रखी कि आवश्यकता पड़ने पर वे उपस्थित होंगे और भविष्य की सभी न्यायिक कार्यवाहियों के दौरान शालीनता और मर्यादा बनाए रखेंगे।
भाषा शोभना वैभव
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