'चलो संसद' मार्च के बाद देशभर से और प्रदर्शनकारी पहुंच रहे जंतरमंतर
रमण
- 22 Jul 2026, 10:27 PM
- Updated: 10:27 PM
नयी दिल्ली, 22 जुलाई (भाषा) बसों और ट्रेनों से रात-रातभर यात्रा कर देशभर से प्रदर्शनकारियों के राष्ट्रीय राजधानी पहुंचने के साथ जंतर-मंतर पर नारेबाजी तेज हो गई और भीड़ भी बढ़ गई।
'चलो संसद' मार्च के दो दिन बाद भी जंतर मंतर धरना जारी है और इसमें नए लोग शामिल हो रहे हैं। कई लोग रात भर का सफर करके पीठ पर बैग और बैनर लेकर विरोध-प्रदर्शन वाली जगह पर पहुंचे हैं। जैसे-जैसे और लोग इस जमावड़े में शामिल होते जा रहे हैं, स्वयंसेवक ने उन्हें बैठने की जगह की ओर भेज रहे हैं और पीने का पानी एवं खाने के पैकेट बांट रहे हैं।
स्कूल वर्दी पहने बच्चे, कॉलेज के विद्यार्थियों, ऑफिस जाने वाले लोग और बुजुर्ग प्रदर्शनकारी कंधे से कंधा मिलाकर खड़े नजर आये। कुछ लोग सड़क पर बैठकर मंच से हो रहे भाषण सुन रहे थे, जबकि कुछ अन्य पुलिस बैरिकेड के पास जमा होकर नारे लगा रहे थे और तख्तियां उठाये हुये थे।
जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती गई, कई प्रदर्शनकारी मंच और नीचे जमा लोगों को बेहतर ढंग से देखने के लिए पास के पेड़ों पर चढ़ गए एवं शाखाओं से झंडे लहराने लगे, जबकि पूरे इलाके में नारे गूंजते रहे।
पूरे दिन माहौल जोश से भरा रहा। हर कुछ मिनटों में, भीड़ के अलग-अलग हिस्सों से जवाबदेही और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग करने वाले नारे लगते रहे।
प्राथमिक उपचार किट और पानी की बोतलें लिए स्वयंसेवक भीड़ के बीच घूम रहे थे, जबकि प्रदर्शनकारियों के नए समूह कंधों पर झंडे और बगल में बैनर दबाए प्रदर्शन वाली जगह पर आ रहे थे।
व्यवस्था संभालने में मदद कर रहे स्वयंसेवक गुरप्रीत सिंह ने कहा,''सुबह से ही लोग आ रहे हैं और अब भी आ रहे हैं।''
उन्होंने कहा, ''कई लोगों ने हमें बताया कि सोमवार का मार्च देखने के बाद वे पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश से रात भर बस का सफर करके आए हैं। हर घंटे नए-नए समूह अपने बैग लेकर आ रहे हैं और विरोध-प्रदर्शन में शामिल हो रहे हैं।''
इनमें 20 साल की अदिति शर्मा भी थी जो जयपुर से अपने चार दोस्तों के साथ आई। उसने कहा, ''हमने कल रात बस पकड़ी और आज सुबह दिल्ली पहुंचे।''
पंजाब से 70 साल के बलदेव एक छड़ी के सहारे यहां पहुंचे। उन्होंने कहा, ''मेरे परिवार ने मुझे उम्र की वजह से यात्रा न करने के लिए कहा था, लेकिन फिर भी मैं आया। जब मैं यहां पहुंचा, तो मैंने देखा कि बच्चे, छात्र, महिलाएं और बुज़ुर्ग सभी एक साथ बैठे थे।''
भाषा राजकुमार रमण
रमण
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