हरिके पत्तन में 'शहीदी' स्मारक का निर्माण होगा : अकाल तख्त जत्तेदार
वैभव
- 14 Jul 2026, 10:33 PM
- Updated: 10:33 PM
(तस्वीर के साथ)
तरन-तारन, 14 जुलाई (भाषा) सिखों के शीर्ष धार्मिक निकाय अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज ने मंगलवार को घोषणा की कि तरन-तारन जिले के हरिके पत्तन में 'शहीदी' स्मारक बनाया जाएगा।
उन्होंने मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा और पंजाब में उग्रवाद के दौर में लापता हुए या कथित तौर पर न्यायेत्तर हत्याओें के शिकार हुए उन सिख युवाओं की आत्मा की शांति के लिए 'अरदास' (सिख प्रार्थना) की।
सतलुज नदी के किनारे 'अरदास' करने की घोषणा सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था के मुख्य जत्थेदार ने की थी। यह फैसला दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' को लेकर विवाद के बाद लिया गया है। यह फिल्म कथित तौर पर खालड़ा के जीवन पर आधारित है, जिन्होंने ऐसे मामलों को सबके सामने लाया था।
गड़गज ने मंगलवार शाम 'अरदास' के बाद एक जनसभा को संबोधित करते हुए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) से उस स्थान पर एक स्मारक बनाने को कहा, जो उन लोगों को समर्पित हो जिनके शवों का उग्रवाद के दौर में लावारिस मानकर अंतिम संस्कार कर दिया गया था।
उन्होंने कहा कि हरिके पत्तन को अब 'शहीदी पत्तन' के नाम से जाना जाएगा।
जत्थेदार गड़गज ने यह भी घोषणा की कि अकाल तख्त, एसजीपीसी के साथ मिलकर, उन लोगों का रिकॉर्ड तैयार करेगा जिनकी कथित तौर पर ''1982 और 1995 के बीच हत्या कर दी गई थी और उन्हें अज्ञात व्यक्तियों की श्रेणी में रखा गया था।''
अकाल तख्त द्वारा यहां हरिके पत्तन में आयोजित 'अरदास' में बड़ी संख्या में लोग जमा हुए थे। इनमें वे लोग भी शामिल थे जिनके परिवार के सदस्य उग्रवाद के दौर में लापता हो गए थे।
गड़गज ने पहले कहा था कि अब तक ''पंजाब में सरकार और पुलिस की ज्यादतियों का शिकार हुए बेगुनाह युवाओं, महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों के लिए'' कोई सामूहिक 'अरदास' नहीं की गई है।
केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू ने अकाल तख्त की 'अरदास' से पहले जत्थेदार से अपील की थी कि वह अपनी 'अरदास' में 1990 के दशक के दौरान पंजाब में हुई हिंसा के सभी पीड़ितों को भी याद करें।
मंत्री ने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर जारी एक बयान में कहा, ''उस समय जो खून बहा, वह न तो केवल आतंकवादियों का था, न पुलिस का और न ही केवल बेगुनाह नागरिकों का। वह पंजाब का खून था। वह पंजाबियों का खून था।''
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता ने रविवार को सवाल उठाया कि फिल्म 'सतलुज' में ''बेगुनाह हिंदुओं के नरसंहार'' और ''पंजाब पुलिस के जवानों, सुरक्षा बलों और आतंकवाद से लड़ने वाले अनगिनत बहादुर नागरिकों के बलिदान'' को कम करके क्यों दिखाया गया।
इससे पहले, जसवंत सिंह खालड़ा की पत्नी परमजीत कौर खालड़ा ने सोमवार को अकाल तख्त से 'पीपुल्स कमीशन' गठित करने की अपील की थी, ताकि 1980 और 1990 के दशक में पंजाब में लापता हुए लोगों, अज्ञात शवों तथा कथित फर्जी पुलिस मुठभेड़ों में मारे गए लोगों की वास्तविक संख्या का पता लगाया जा सके।
कौर की यह टिप्पणी फिल्म 'सतलुज' के प्रदर्शन और बाद में उसे ओटीटी मंच 'जी5' से हटाए जाने के बाद, खालड़ा मामले पर फिर से चर्चा शुरू होने के बीच आई। यह फिल्म पहले 'पंजाब 95' शीर्षक से बनाई गई थी और जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है।
जसवंत सिंह खालड़ा का सितंबर 1995 में अमृतसर स्थित उनके घर के बाहर से कथित तौर पर अपहरण कर लिया गया था। बाद में उनकी हत्या किए जाने की पुष्टि हुई, हालांकि उनका शव कभी बरामद नहीं हुआ।
सीबीआई की एक विशेष अदालत ने नवंबर 2005 में खालड़ा के अपहरण और हत्या के मामले में पूर्व पुलिस उपाधीक्षक जसपाल सिंह और सहायक उप निरीक्षक अमरजीत सिंह को उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी, जबकि चार अन्य पुलिसकर्मियों को सात-सात साल की जेल की सज़ा दी गई थी।
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने 2007 में अमरजीत सिंह को बरी कर दिया और बाकी चार दोषियों की सजा बढ़ाकर उम्रकैद में तब्दील कर दी। उच्चतम न्यायालय ने 2011 में इस फैसले को बरकरार रखा।
भाषा धीरज वैभव
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