अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला 'द सेकंड ऑर्बिट' के साथ लेखक बने
नरेश
- 04 Jun 2026, 07:04 PM
- Updated: 07:04 PM
नयी दिल्ली, चार जून (भाषा) अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) की यात्रा करने वाले पहले भारतीय शुभांशु शुक्ला अब लेखक बनने जा रहे हैं। उनकी किताब ''द सेकेंड ऑर्बिट: बिलीफ ऑफ ए मैन…ड्रीम्स ऑफ 1.4 बिलियन हार्ट्स'' 25 जून को बाजार में उपलब्ध होगी।
पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया (पीआरएचआई) द्वारा प्रकाशित संस्मरण में ग्रुप कैप्टन शुक्ला मानव अंतरिक्ष उड़ान की वास्तविकताओं को साझा करते हैं। इसमें उन्होंने अंतरिक्ष उड़ान की वास्तविकताओं का वर्णन किया है, जिसमें वर्षों की तैयारी, असफलताएं, अनुशासन, कठोर प्रशिक्षण, अनिश्चितताएं और उस सपने को पूरा करने के लिए जरूरी अटूट विश्वास शामिल है, जो अक्सर असंभव प्रतीत होता था।
शुक्ला उन चार अंतरिक्ष यात्रियों में से एक थे, जिन्होंने पिछले साल जून में अंतरिक्ष यात्रा की और नासा के एक्सिओम-4 मिशन के तहत आईएसएस पर 18 दिन बिताए। यह उपलब्धि चार दशक बाद किसी भारतीय की अंतरिक्ष में वापसी का प्रतीक बनी। इससे पहले वर्ष 1984 में विंग कमांडर राकेश शर्मा अंतरिक्ष में जाने वाले पहले भारतीय बने थे।
शुक्ला ने अपनी किताब में लिखा है, ''उड़ान से पहले ही मैं एक सवाल के साथ कैप्सूल में गया-इस मिशन का अर्थ क्या होना चाहिए? एक अंतरिक्ष उड़ान भविष्य की तकनीकों के द्वार खोलती है, लेकिन इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यह एक ऐसी भावना को जन्म देती है जिसे मापना कठिन है-किसी बच्चे के मन में यह विश्वास जगना कि उसके लिए संभावनाओं का एक नया दरवाजा खुल गया है।''
अशोक चक्र से सम्मानित शुक्ला ने एक बयान में कहा, ''42 वर्ष पहले राकेश शर्मा ने मेरी पीढ़ी सहित पूरे एक दौर के लिए उस दरवाजे को खोला था। यह पुस्तक उस दरवाजे को अगली पीढ़ी के लिए खुला रखने का मेरा एक प्रयास है।''
रोचक किस्सों और दुर्लभ प्रत्यक्ष अनुभवों के माध्यम से शुक्ला पाठकों को अंतरिक्ष यात्री चयन प्रक्रिया, वर्षों के कठिन प्रशिक्षण, आईएसएस पर बिताए गए जीवन और वहां तक पहुंचने की यात्रा से रूबरू करवाएंगे।
प्रकाशकों के अनुसार, ''द सेकेंड ऑर्बिट'' केवल अंतरिक्ष की कहानी नहीं है। यह आत्मविश्वास, डर पर काबू पाकर अवसरों को स्वीकार करने और 1.4 अरब भारतीयों की उम्मीदों को पृथ्वी के वायुमंडल से परे ले जाने की प्रेरक यात्रा की कहानी है।
शुक्ला (40) ने कहा, ''जब मैं बच्चा था, तब मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं अंतरिक्ष यात्री बनूंगा। मैं भी उसी तरह कक्षा में बैठता था, वही गृहकार्य करता था और मेरे मन में भी केवल एक छोटी-सी इच्छा थी-कॉकपिट में पांच मिनट बैठने की। यह पुस्तक आज उस कक्षा में बैठे हर उस बच्चे के लिए है, जिसे अभी तक यह नहीं बताया गया है कि उसका सपना बहुत बड़ा है।''
वर्तमान में बेंगलुरु में कार्यरत शुक्ला भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के गगनयान मिशन के लिए चुने गए चार अंतरिक्ष यात्रियों में से एक हैं।
भाषा आशीष नरेश
नरेश
0406 1904 दिल्ली