\"कुछ ही घंटों में सब खत्म हो गया\", आठ अपनों को खोने वाले परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़
रंजन
- 04 Jun 2026, 04:40 PM
- Updated: 04:40 PM
(तस्वीरों के साथ)
नयी दिल्ली/गुरुग्राम, चार जून (भाषा) "मेरा पूरा परिवार तबाह हो गया। हमने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि हमारे साथ ऐसा कुछ हो सकता है।" यह कहना है महेंद्र गर्ग का जिन्होंने दिल्ली के मालवीय नगर स्थित एक होटल में लगी भीषण आग में अपने चचेरे भाई और परिवार के सात अन्य सदस्यों को खो दिया।
मालवीय नगर के 'फ्लरिश स्टे बीएंडबी' (होटल) में बुधवार सुबह लगी भीषण आग में कई विदेशी नागरिकों सहित 21 लोगों की मौत हो गई और कई अन्य झुलस गए।
मृतकों में 48 वर्षीय विवेक अग्रवाल, उनकी पत्नी तर्जिनी, उनकी दो बेटियां, मां एवं तीन अन्य रिश्तेदार शामिल हैं।
बृहस्पतिवार को अस्पताल के शवगृह के बाहर खड़े गर्ग ने अपने चचेरे भाई विवेक अग्रवाल के साथ हुई आखिरी बातचीत को याद किया, जो आग के घातक होने से बमुश्किल 10 मिनट पहले हुई थी। अग्रवाला पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) थे।
गर्ग ने कांपती आवाज में कहा, "हादसा बढ़ने से करीब 10 मिनट पहले उसने मुझे फोन किया था। वह घबराते हुए कह रहा था, 'मैं बेसमेंट में फंस गया हूं। कृपया जल्दी से फायर ब्रिगेड भेजो और मुझे यहां से निकालो'।"
उन्होंने रुआंसे होते हुए कहा, "सभी आठ लोग चले गए। मेरा पूरा परिवार खत्म हो गया। वे यहां इस उम्मीद में आए थे कि अग्रवाल के पिता बीमारी से ठीक हो जाएंगे। इसके बजाय, हम अपने प्रियजनों के शव वापस लेकर जा रहे हैं।"
रिश्तेदारों ने बताया कि परिवार ने इस होटल में कमरे इसलिए बुक किए थे क्योंकि यह उस अस्पताल के नजदीक था जहां विवेक के बीमार पिता राधेश्याम अग्रवाल भर्ती थे।
दिनभर चली पोस्टमॉर्टम की औपचारिकताओं के बाद मृतक परिवार के सदस्यों के शव रिश्तेदारों को सौंप दिए गए और उन्हें गुरुग्राम स्थित उनके आवास पर ले जाया गया, जहां शाम को उनका अंतिम संस्कार किया जायेगा।
एक शोक संतप्त परिजन ने कहा, "इस नुकसान को बयां करने के लिए शब्द नहीं हैं। कुछ ही घंटों में सब कुछ बदल गया।"
शवगृह के बाहर खड़े रिश्तेदारों ने होटल में सुरक्षा इंतजामों पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि इमारत की बनावट ऐसी थी कि मेहमानों के पास बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं बचा।
गर्ग ने आरोप लगाया, "होटल अत्यधिक भीड़भाड़ वाले इलाके में स्थित है। वहां अंदर आना और बाहर जाना बेहद मुश्किल है। बाहर निकलने का केवल एक ही रास्ता था और एक ही सीढ़ी थी। पूरी इमारत कांच से ढकी हुई थी और यहां तक कि खिड़कियों पर लोहे की ग्रिल लगी हुई थी।"
तर्जिनी अग्रवाल के पिता प्रेम बंसल ने बताया कि इस अग्निकांड में उनके परिवार के पांच सदस्य और तीन अन्य रिश्तेदार फंस गए थे।
उन्होंने कहा, "इस हादसे का शिकार हुए आठ लोगों में से पांच मेरे परिवार के थे।"
इस त्रासदी ने जीवित बचे रिश्तेदारों को गहरे सदमे में डाल दिया है और वे इस भारी नुकसान से उबर नहीं पा रहे हैं।
होटल से कम से कम 58 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला गया, लेकिन 21 लोगों की झुलसने और दम घुटने के कारण मौत हो गई। यह हाल के वर्षों में राष्ट्रीय राजधानी में हुई सबसे भीषण आग त्रासदियों में से एक है।
भाषा सुमित रंजन
रंजन
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