सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में पुजारियों एवं अन्य कर्मियों के वेतन की समीक्षा के लिए जनहित याचिका
प्रशांत
- 10 May 2026, 03:28 PM
- Updated: 03:28 PM
(फाइल फोटो के साथ)
नयी दिल्ली, 10 मई (भाषा) उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर केंद्र और राज्य सरकारों को सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में पुजारियों, सेवादारों और अन्य कर्मचारियों को दिए जाने वाले वेतन और अन्य लाभों की समीक्षा के लिए एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।
अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने यह जनहित याचिका दायर की है जिसमें केंद्र और राज्यों को सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों में पुजारियों और अन्य कर्मचारियों को दिए जाने वाले वेतन और अन्य लाभों की समीक्षा के लिए एक न्यायिक आयोग या विशेषज्ञ समिति गठित करने का निर्देश देने का अनुरोध किया गया है।
याचिका में कहा गया है, ''याचिकाकर्ता ने यह घोषणा करने का भी अनुरोध किया है कि पुजारी और मंदिर के कर्मचारी वेतन संहिता, 2019 की धारा 2(के) के तहत 'कर्मचारी' हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि एक बार जब सरकार मंदिरों के प्रशासनिक, आर्थिक और वित्तीय नियंत्रण अपने हाथ में ले लेती है, तो नियोक्ता-कर्मचारी संबंध स्थापित हो जाता है। ऐसे में पुजारियों और मंदिर के अन्य कर्मचारियों को सम्मानजनक वेतन से वंचित करना अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत आजीविका के अधिकार का उल्लंघन है।''
उपाध्याय ने कहा कि इस कदम का कारण यह है कि चार अप्रैल को जब वह एक सार्वजनिक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए वाराणसी गए तब सरकारी नियंत्रण वाले काशी विश्वनाथ मंदिर में 'रुद्राभिषेक' करने के बाद उन्हें पता चला कि पुजारियों और मंदिर के अन्य कर्मचारियों को सम्मानजनक जीवन यापन के लिए न्यूनतम मजदूरी भी नहीं दी जाती है।
याचिका में कहा गया, ''हाल में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों ने न्यूनतम मजदूरी की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया। मंदिरों के पुजारियों और अन्य कर्मचारियों को सरकार द्वारा अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिए निर्धारित न्यूनतम मजदूरी भी नहीं मिल रही है। यह एक व्यवस्थित शोषण है। राज्य बंदोबस्ती विभाग के माध्यम से एक आदर्श नियोक्ता के रूप में कार्य कर रहा है, लेकिन न्यूनतम मजदूरी अधिनियम और राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों (अनुच्छेद 43) का उल्लंघन कर रहा है।''
याचिका में कहा गया है कि 2026 के मुद्रास्फीति-समायोजित जीवन निर्वाह लागत सूचकांक के साथ न्यूनतम मजदूरी का लगातार समायोजन नहीं करने से याचिकाकर्ता को पुजारियों और मंदिर कर्मचारियों के और अधिक हाशिए पर जाने से रोकने के लिए न्यायिक हस्तक्षेप की मांग करने के लिए मजबूर होने पड़ा।
उपाध्याय ने कहा कि आजीविका की अनिश्चित प्रकृति सात फरवरी, 2025 को तब स्पष्ट रूप से उजागर हुई, जब तमिलनाडु के एक विभाग ने मदुरै के 'दंडायुथापानी स्वामी मंदिर' में एक परिपत्र जारी कर पुजारियों को 'आरती की थालियों' में 'दक्षिणा' स्वीकार करने से सख्ती से रोक दिया।
उन्होंने कहा कि ऐसे मंदिरों में पुजारियों को कोई औपचारिक वेतन नहीं मिलता है, वे पूरी तरह दक्षिणा पर आश्रित रहते हैं लेकिन सरकार के आदेश ने उनके सामने भूखों मरने वाली स्थिति पैदा कर दी।
उन्होंने कहा कि जनाक्रोश के बाद यह कदम वापस लिया गया लेकिन यह घटना पुजारियों की उत्तरजीविता पर सरकार के मनमानेपन को दर्शाती है।
याचिकाकर्ता ने उच्चतम न्यायालय से अनुरोध किया कि वह इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पिछले निर्णयों के आलोक में केंद्र एवं राज्य सरकारों को पुजारियों, सेवादारों एवं अन्य कर्मियों के कल्याण के वास्ते उपयुक्त कदम उठाने का आदेश दे।
भाषा राजकुमार प्रशांत
प्रशांत
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