संवैधानिक नैतिकता सरकार पर एक निरोधक कारक: प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़
अमित सुरेश
- 29 Jun 2024, 09:06 PM
- Updated: 09:06 PM
कोलकाता, 29 जून (भाषा) भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) डी वाई चंद्रचूड़ ने शनिवार को कहा कि "संवैधानिक नैतिकता" सरकार पर एक निरोधक कारक है जो उन स्थितियों को निर्मित होने देती है जो विविधता का सम्मान करती है, समावेश और सहिष्णुता को बढ़ावा देती है।
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि भारत केवल बड़े शहरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के सबसे छोटे गांव और सबसे छोटे तालुका तक फैला हुआ है, चाहे वे जुड़े हों या नहीं, पहुंच योग्य हों या नहीं।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि "नैतिकता से इतर "संवैधानिक नैतिकता" सरकार पर एक निरोधक कारक है।
राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी (पूर्वी क्षेत्र) के दो-दिवसीय क्षेत्रीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि संवैधानिक नैतिकता समाज के हर घटक का समाधान करती है और ऐसी स्थितियों को निर्मित होने देती है, जो "विविधता का सम्मान करती है, समावेश और सहिष्णुता को बढ़ावा देती है।"
सीजेआई ने कहा कि यह सरकार का यह कर्तव्य भी निर्धारित करता है कि वह उस समाज के निर्माण में सहायता करे, जिसकी परिकल्पना संविधान में की गई है।
उन्होंने कहा, "संविधान में नैतिकता शब्द का इस्तेमाल किया गया है, लेकिन इसमें ‘संवैधानिक नैतिकता’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है।"
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने कहा कि संविधान नैतिकता सहित विभिन्न आधारों पर स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार पर कानून द्वारा पाबंदी लगाने की अनुमति देता है।
उन्होंने कहा कि संविधान यह भी विचार करता है कि गठजोड़ बनाने की स्वतंत्रता के अधिकार पर नैतिकता के आधार पर पाबंदी लगायी जा सकती है।
उन्होंने कहा कि एक स्तर पर संवैधानिक नैतिकता उन मूल्यों पर आधारित है जो संविधान की प्रस्तावना में निर्धारित हैं। सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा, "संवैधानिक नैतिकता एक व्यापक सिद्धांत है जो संविधान में निहित विशिष्ट अधिकारों या मूल्यों से प्राप्त होता है, लेकिन इन्हीं तक सीमित नहीं है।"
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ के अनुसार, यह एक एकीकृत संवैधानिक नैतिकता प्रदान करता है ताकि प्रत्येक भारतीय नागरिक अपनी इच्छानुसार सोच और बोल सके, अपनी इच्छानुसार उपासना कर सके, जिसका चाहे अनुसरण कर सके, जो चाहे खा सके और जिससे चाहे विवाह कर सके या विवाह ही न कर सके।’’
उन्होंने कहा कि जब न्यायाधीशों को 'ऑनर', 'लॉर्डशिप' या 'लेडीशिप' कहकर संबोधित किया जाता है, तो इसका गंभीर खतरा पैदा हो जाता है कि "हम स्वयं को मंदिरों के देवताओं के रूप में देखने लगें" क्योंकि लोग कहते हैं कि अदालत न्याय का मंदिर है।
उन्होंने कहा कि वह न्यायाधीश की भूमिका को जनता के सेवक के रूप में पुनः स्थापित करना चाहेंगे, जिससे करुणा और सहानुभूति की भावना सामने आएगी।
उन्होंने कहा कि संवैधानिक नैतिकता की ये अवधारणाएं न केवल उच्चतर न्यायपालिका के न्यायाधीशों के लिए महत्वपूर्ण हैं, बल्कि जिला न्यायपालिका के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि आम नागरिकों की भागीदारी इसी स्तर पर शुरू होती है।
सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि यह चीज तेजी से देखी जा रही है कि न्यायाधीश निर्णयों में अपनी विचारधाराओं के बारे में लिखते हैं।
उन्होंने कहा कि किसी न्यायाधीश की व्यक्तिगत धारणा कि क्या सही है या क्या गलत है, संवैधानिक नैतिकता पर हावी नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने कहा, "कृपया याद रखें कि हम संविधान के सेवक हैं, हम संविधान के स्वामी नहीं हैं।"
उन्होंने कहा कि एक न्यायपूर्ण समाज न्यायाधीश की कल्पना का प्रतिबिंब नहीं हो सकता, बल्कि संविधान ने इसकी परिकल्पना की है।
प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा, "यह एक ऐसा समाज है जो मानवीय गरिमा, बंधुत्व, समानता, स्वतंत्रता, सभी के प्रति सम्मान, सभी के प्रति सहिष्णुता और सभी के समावेश पर आधारित है।"
उन्होंने कहा कि भाषा आम लोगों के लिए एक बड़ी बाधा है, जिनके लिए कानून और कानूनी प्रणाली है। उन्होंने कहा कि प्रौद्योगिकी ने पिछले 75 वर्षों में उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित 37,000 निर्णयों का बांग्ला सहित संविधान में मान्यता प्राप्त सभी भाषाओं में अनुवाद करने की पहल की है।
उन्होंने यह ध्यान में रखते हुए निर्णय सरल रूप में लिखने पर जोर दिया कि ये वादियों के लिए है, जो आम लोग हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उच्चतम न्यायालय कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ प्रयोग कर रहा है।
उच्चतम न्यायालय, मामलों में त्रुटियों के सत्यापन में मानवीय हस्तक्षेप को समाप्त करने की तैयारी में है, जैसे कि न्यायालय शुल्क का भुगतान या प्रत्येक पृष्ठ पर हस्ताक्षर किए गए हैं या नहीं।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कार्यक्रम में विशेष संबोधन देते हुए न्यायपालिका के सदस्यों से यह सुनिश्चित करने की अपील की कि न्याय वितरण प्रणाली में राजनीतिक पूर्वाग्रह का हस्तक्षेप न हो।
कलकत्ता उच्च न्यायालय और पश्चिम बंगाल न्यायिक अकादमी के सहयोग से आयोजित कार्यक्रम में कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश टी एस शिवज्ञानम भी मौजूद थे।
भाषा अमित