न्यायालय नीट-पीजी अर्हता अंकों में कमी से शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ने वाले प्रभाव पर विचार करेगा
दिलीप
- 23 Feb 2026, 08:20 PM
- Updated: 08:20 PM
नयी दिल्ली, 23 फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि वह इस बारे में विचार करेगा कि क्या 'नीट-पीजी' 2025-26 के लिए अर्हता अंकों में की गई भारी कमी से स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा पर असर पड़ता है।
न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने मौजूदा शैक्षणिक वर्ष के लिए 'कट-ऑफ' में कमी को चुनौती देने वाली याचिकाओं के एक समूह पर सुनवाई करते हुए ये टिप्पणियां कीं।
शीर्ष अदालत ने कहा, ''शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ने वाला प्रतिकूल प्रभाव ही हमारी सबसे बड़ी चिंता है। यह गुणवत्ता का मामला है। आपको यह साबित करना होगा कि कटऑफ में इतनी भारी कमी से शिक्षा की गुणवत्ता पर बहुत कम असर पड़ेगा। हालांकि, आपका यह कहना तार्किक है कि यह एमबीबीएस में प्रवेश पाने जैसा नहीं है, बल्कि स्नातकोत्तर में दाखिले का मुद्दा है। यह एक अलग तरह का मामला है, क्योंकि (पीजी के लिए) आवेदन करने वाले पहले से ही डॉक्टर होते हैं। हमें इस मुद्दे पर विचार करना होगा।''
केंद्र सरकार की ओर से पेश हुईं अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने सरकार की ओर से दाखिल हलफनामे में दी गई दलील का हवाला देते हुए कहा कि सीट की रिक्तियों को देखते हुए यह निर्णय लिया गया है।
उन्होंने कहा कि यह परीक्षा न्यूनतम क्लिनिकल योग्यता को प्रमाणित नहीं करती, क्योंकि उम्मीदवारों के पास पहले से ही एमबीबीएस की डिग्री होती है और राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा-स्नातकोत्तर (नीट-पीजी) का उद्देश्य सीमित सीट संख्या को देखते हुए उम्मीदवारों के बीच तुलना करना और उनमें से अपात्र को बाहर करना है।
न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने कहा कि हालांकि केंद्र सरकार का यह कहना उचित है कि नीट-पीजी परीक्षा एमबीबीएस में प्रवेश का माध्यम नहीं है और अभ्यर्थी पहले से ही डॉक्टर हैं, फिर भी न्यायालय 'कट-ऑफ' कम करने के प्रभाव पर विचार करना चाहेगा।
न्यायालय ने मामले की अगली सुनवाई 24 मार्च के लिए तय की।
याचिकाकर्ताओं ने 'नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशन इन मेडिकल साइंसेज' (एनबीईएमएस) द्वारा 13 जनवरी को जारी किये गए नोटिस को चुनौती दी है, जिसमें नीट-पीजी 2025-26 के तीसरे दौर की काउंसलिंग के लिए न्यूनतम अर्हता कट-ऑफ को कम कर दिया गया था।
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक ने मामले में दाखिल किये गए अपने हलफनामे में कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा दी गई चुनौती राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग अधिनियम 2019 के तहत सक्षम वैधानिक प्राधिकारों द्वारा जनहित में और विशेषज्ञ संबंधी विनियमन के दायरे में लिये गए एक शैक्षणिक और नीतिगत निर्णय से संबंधित है।
हलफनामे के अनुसार, ''नीट-पीजी के लिए अर्हता प्रतिशत में कमी कोई नयी बात नहीं है। 2017 में नीट-पीजी की शुरुआत से ही, सीट के रिक्त रह जाने को रोकने के लिए उपयुक्त परिस्थितियों में कट ऑफ में कमी की जाती रही है। शैक्षणिक वर्ष 2023 में भी, सभी श्रेणियों में अर्हता प्रतिशत को शून्य कर दिया गया था। इसलिए, वर्तमान निर्णय स्थापित नीति और प्रशासनिक प्रक्रिया के अनुरूप है।''
इसमें कहा गया है, ''यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि नीट-पीजी का उद्देश्य अभ्यर्थियों की न्यूनतम योग्यता द्वारा स्थापित न्यूनतम क्षमता को प्रमाणित करना नहीं है, बल्कि स्नातकोत्तर सीट के आवंटन के लिए समूह के बीच एक मेधा सूची तैयार करना है।''
इसमें कहा गया है कि शैक्षणिक सत्र 2025-26 के लिए कुल उपलब्ध सीट लगभग 70,000 थीं, जो अभ्यर्थियों की कुल संख्या 2,24,029 के अनुरूप है।
भाषा सुभाष दिलीप
दिलीप
2302 2020 दिल्ली