उच्चतम न्यायालय ने पुणे पोर्श कार दुर्घटना मामले में तीन आरोपियों को जमानत दी
दिलीप
- 02 Feb 2026, 09:50 PM
- Updated: 09:50 PM
नयी दिल्ली, दो फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने 2024 में पुणे में पोर्श कार दुर्घटना मामले में तीन आरोपियों को सोमवार को जमानत दे दी, जिसमें दो लोगों की जान चली गई थी।
न्यायालय ने यह भी कहा कि नाबालिगों से जुड़ी ऐसी घटनाओं के लिए माता-पिता ही जिम्मेदार हैं, क्योंकि वे अपने बच्चों को काबू में रखने में सक्षम नहीं हैं।
न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने आरोपियों अमर संतिश गायकवाड़ (कथित बिचौलिए), आदित्य अविनाश सूद और आशीष सतीश मित्तल (कार में सवार दो अन्य नाबालिगों के अभिभावक) के 18 महीनों से हिरासत में होने का उल्लेख करते हुए उन्हें जमानत दे दी।
सूद और मित्तल पर अपने बच्चों के रक्त के नमूनों को बदलने की साजिश रचने का आरोप है।
पीठ ने कहा, "इन नाबालिगों के अभिभावक के बारे में कुछ कहना जरूरी है। उनका अपने बच्चों पर कोई नियंत्रण नहीं है। नशीली दवाओं का सेवन एक अलग मसला है, लेकिन उन्हें (बच्चों को) कार की चाबियां और मौज-मस्ती करने के लिए पैसे देना अस्वीकार्य है।''
पीठ ने गौर किया कि पीछे की सीट पर बैठे नाबालिगों के खिलाफ कोई आरोप नहीं हैं और उनके पिताओं पर रक्त के नमूनों को बदलने का आरोप है।
अदालत ने कहा, ''नशीली दवाओं के सेवन के साथ जश्न मनाना और फिर तेज गति से गाड़ी चलाना जिसके परिणामस्वरूप सड़क पर निर्दोष लोगों या सड़क पर सो रहे निर्दोष लोगों की मौत हो जाती है... कानून के कठघरे में उन्हें लाना ही होगा।''
न्यायमूर्ति नागरत्ना ने कहा, "सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन नाबालिगों के माता-पिता ही बच्चों को कार की चाबियां सौंपने और उन्हें मौज-मस्ती करने के लिए पर्याप्त धन देने को लेकर जिम्मेदार हैं...यही समस्या है। इन माता-पिता के पास अपने बच्चों से बात करने, उनसे संवाद करने और उनके साथ समय बिताने का समय नहीं है। तो इसका समाधान क्या है? उन्हें पैसे दे दो, एटीएम कार्ड दे दो।"
अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद तीनों आरोपियों को जमानत दे दी और उन्हें जांच में सहयोग का निर्देश दिया।
न्यायालय ने 23 जनवरी को इस मामले में आरोपी गायकवाड़ द्वारा दायर जमानत याचिका पर महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा था।
पुणे के कल्याणी नगर इलाके में 19 मई 2024 को कथित तौर पर शराब के नशे में धुत 17 वर्षीय लड़के द्वारा चलाई जा रही एक पोर्श कार ने दो आईटी पेशेवरों को टक्कर मार दी, जिससे उनकी मौत हो गई थी।
उच्चतम न्यायालय ने सात जनवरी को इस मामले में जमानत का अनुरोध कर रहे दो अन्य आरोपियों द्वारा दायर याचिकाओं पर महाराष्ट्र सरकार से जवाब मांगा था।
सूद (52) और मित्तल (37) को पिछले साल 19 अगस्त को गिरफ्तार किया गया था, क्योंकि उनके रक्त के नमूनों का इस्तेमाल दो नाबालिगों के संबंध में परीक्षण के लिए किया गया था, जो दुर्घटना के समय 17 वर्षीय मुख्य आरोपी के साथ कार में थे।
पिछले साल 16 दिसंबर को बंबई उच्च न्यायालय ने इस मामले में गायकवाड़, सूद और मित्तल सहित आठ आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं।
किशोर न्याय बोर्ड ने नाबालिग आरोपी को मामूली शर्तों पर जमानत दे दी थी, जिससे पूरे देश में आक्रोश फैल गया था। जमानत की शर्तों में सड़क सुरक्षा पर 300 शब्दों का निबंध लिखना शामिल था।
आरोपी नाबालिग को जमानत दिए जाने पर मचे बवाल के बाद पुणे पुलिस ने किशोर न्याय बोर्ड से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया। इसके बाद बोर्ड ने आदेश में संशोधन करते हुए नाबालिग को एक सुधार गृह में भेज दिया। जून में उच्च न्यायालय ने नाबालिग को रिहा करने का आदेश दिया।
इस मामले में शामिल नाबालिग को सुधार गृह से रिहा कर दिया गया, जबकि उसके माता-पिता विशाल अग्रवाल और शिवानी अग्रवाल, डॉक्टर अजय तावरे और श्रीहरि हलनोर, ससून अस्पताल के कर्मचारी अतुल घाटकांबले, आदित्य अविनाश सूद, आशीष मित्तल और अरुण कुमार सिंह तथा दो बिचौलियों सहित 10 आरोपियों को रक्त के नमूने बदलने के मामले में गिरफ्तार कर लिया गया।
भाषा आशीष दिलीप
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