न्यायमूर्ति वर्मा को हटाए जाने संबंधी प्रस्ताव पर राज्यसभा महासचिव के मसौदा निर्णय तैयार करने से न्यायालय नाखुश
पारुल प्रशांत
- 16 Jan 2026, 11:08 PM
- Updated: 11:08 PM
नयी दिल्ली, 16 जनवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को हटाए जाने से संबंधित प्रस्ताव पर “सभापति की ओर से मसौदा निर्णय” तैयार करने के राज्यसभा के महासचिव के कदम पर शुक्रवार को नाखुशी जाहिर की।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने हालांकि न्यायमूर्ति वर्मा की ओर से दायर उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष के उन्हें पद से हटाने की मांग वाले प्रस्ताव को स्वीकार करने संबंधी फैसले को चुनौती दी गई थी।
इस याचिका में न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कर रही संसदीय समिति की वैधता को भी चुनौती दी गई थी।
न्यायमूर्ति वर्मा को 14 मार्च 2025 को नयी दिल्ली स्थित उनके आधिकारिक आवास पर नोटों की जली हुई गड्डियां मिलने के बाद दिल्ली उच्च न्यायालय से इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वापस भेज दिया गया था।
पीठ ने कहा कि राज्यसभा के महासचिव ने विशुद्ध प्रशासनिक भूमिका से परे जाकर काम किया, जैसा कि दस्तावेज में इस्तेमाल भाषा से स्पष्ट है। उसने कहा, “मामले में आगे बढ़े बिना, हम यह कहना उचित समझते हैं कि प्रस्ताव पर सचिवालय स्तर पर जिस तरह से कार्रवाई की गई, वह कानून के तहत परिकल्पित भूमिका के साथ पूरी तरह से मेल नहीं खाती है।”
शीर्ष अदालत ने राज्यसभा के उपसभापति के न्यायमूर्ति वर्मा को हटाए जाने संबंधी प्रस्ताव को स्वीकार न करने के फैसले की सात पृष्ठों की प्रमाणित प्रति का अवलोकन करने के बाद कहा कि मसौदा निर्णय उपसभापति के समक्ष रखा गया था, जिन्होंने महासचिव के फैसले से स्पष्ट रूप से सहमति जताई थी।
न्यायालय ने कहा, “हम आशा करते हैं कि किसी अन्य न्यायाधीश को भ्रष्टाचार के आरोपों के आधार पर सेवा से हटाए जाने संबंधी कार्यवाही का सामना न करना पड़े। अगर दुर्भाग्यवश किसी न्यायाधीश के प्रथम दृष्टया भ्रष्टाचार में शामिल होने का मामला फिर से सामने आता है और जनप्रतिनिधि इन आरोपों के आधार पर जांच की मांग करते हैं, तो सचिवालय की ओर से संयम बरतना और प्रस्ताव स्वीकार करने का फैसला लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा सभापति (जैसा भी मामला हो) पर छोड़ना उचित होगा, न कि आगे की कार्रवाई तय करना।”
पीठ ने राज्यसभा के महासचिव की ओर से तैयार किए गए मसौदा फैसले में कई विसंगतियां पाईं और कहा कि न तो न्यायाधीश (जांच) अधिनियम और न ही उसके तहत बनाए गए नियमों में प्रस्ताव के नोटिस के लिए कोई अनिवार्य प्रारूप निर्धारित है।
पीठ ने कहा, “निर्धारित मापदंडों के अभाव में, यह स्पष्ट नहीं है कि महासचिव ने किस आधार पर निष्कर्ष निकाला कि प्रस्ताव का नोटिस “सही” नहीं था। जहां कोई निर्धारित प्रारूप मौजूद नहीं है, वहां किसी न्यायाधीश के खिलाफ अनुचित व्यवहार के आरोपों वाले नोटिस को केवल मसौदा तैयार करने या प्रारूप में कथित कमियों के कारण अप्रभावी नहीं माना जा सकता।”
उसने कहा, “महासचिव की भूमिका केवल सक्षम प्राधिकारी यानी सभापति के कार्यालय के समक्ष नोटिस रखने तक सीमित थी, जिसमें इसकी स्वीकार्यता के संबंध में कोई निष्कर्ष जाहिर नहीं किया जाता।”
शीर्ष अदालत ने हालांकि, स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां केवल ऊपर उल्लिखित प्रक्रियात्मक पहलुओं तक ही सीमित हैं और सचिवालय स्तर पर अपनाई गई विशेष कार्यप्रणाली का नजीता हैं।
न्यायालय ने कहा, “चूंकि, उपसभापति के प्रस्ताव को स्वीकार न करने का निर्णय चुनौती के अधीन नहीं है और यह उनके संवैधानिक दायित्व के अनुसार स्वतंत्र रूप से लिया गया है, इसलिए ये टिप्पणियां किसी भी तरह से उस निर्णय की वैधता पर कोई प्रभाव नहीं डालती हैं।”
पिछले साल संसद के मानसून सत्र के दौरान लोकसभा और राज्यसभा के सदस्यों ने 21 जुलाई को अपने-अपने सदन में दो प्रस्ताव के नोटिस दिए थे।
लोकसभा के 100 से अधिक सदस्यों के हस्ताक्षर वाले नोटिस में जांच अधिनियम के प्रावधानों का हवाला देते हुए अध्यक्ष के समक्ष एक आवेदन पेश करने के लिए कहा गया था, जिसमें न्यायमूर्ति वर्मा को हटाने की प्रार्थना की गई थी।
उक्त नोटिस लोकसभा अध्यक्ष को दोपहर 12:30 बजे प्राप्त हुआ था, लेकिन उस दिन इसे स्वीकार नहीं किया गया था।
कुछ समय बाद शाम 4:07 बजे से 4:19 बजे के बीच इसी उद्देश्य से राज्यसभा के 50 से अधिक सदस्यों के हस्ताक्षर वाला एक नोटिस उच्च सदन में दिया गया।
राज्यसभा के तत्कालीन सभापति जगदीप धनखड़ ने उक्त नोटिस के संबंध में सदन को संबोधित किया और कहा कि लोकसभा में भी इसी तरह का नोटिस दिया गया होगा।
धनखड़ ने जांच अधिनियम की धारा 3(2) का हवाला देते हुए (जिसमें दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों द्वारा एक समिति के गठन की आवश्यकता होती है, जब किसी न्यायाधीश को हटाने के प्रस्ताव का नोटिस दोनों सदनों में एक ही दिन दिया जाता है), निर्देश दिया कि “महासचिव इस दिशा में आवश्यक कदम उठाएंगे।”
धनखड़ ने बाद में उसी दिन (21 जुलाई 2025) को भारत के उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दे दिया।
बाद में, राज्यसभा में दिए गए नोटिस को नोटिस देने वालों के हस्ताक्षरों के सत्यापन के लिए राज्यसभा सचिवालय के सदस्यों के वेतन और भत्ते शाखा के पास भेजा गया।
नोटिस देने वाले 62 सदस्यों में से तीन के हस्ताक्षर उनके नमूना हस्ताक्षरों से मेल नहीं खाते थे। 11 अगस्त 2025 को राज्यसभा में दिए गए नोटिस की उसके महासचिव ने जांच की, जिन्होंने उसमें कई कमियां पाईं और उसे “ठीक नहीं” माना।
इसके बाद महासचिव के मसौदा निर्णय को राज्यसभा के उपसभापति के समक्ष रखा गया, जो उनकी अनुपस्थिति में सभापति के कार्यों का निर्वहन कर रहे थे। उपसभापति ने निष्कर्ष से सहमति जताई और तदनुसार कहा कि नोटिस “स्वीकार नहीं किया जाए।”
बारह अगस्त 2025 को यह सूचना प्राप्त होने पर कि उपसभापति द्वारा नोटिस स्वीकार नहीं किया गया, लोकसभा अध्यक्ष ने 21 जुलाई को लोकसभा में दिए गए नोटिस को स्वीकार कर लिया और न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया।
भाषा पारुल