विश्वविद्यालयों को स्वतंत्र स्व-शासन वाले संस्थान बनाने संबंधी विधेयक लोकसभा में पेश किया गया
सुभाष वैभव
- 15 Dec 2025, 06:11 PM
- Updated: 06:11 PM
नयी दिल्ली, 15 दिसंबर (भाषा) शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने विश्वविद्यालयों और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों को स्वतंत्र स्व-शासन वाले संस्थान बनाने के उद्देश्य से विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान, 2025 विधेयक सोमवार को लोकसभा में पेश किया। सरकार ने इसे संसद की एक संयुक्त समिति को भेजने पर सहमति जताई।
कांग्रेस के मनीष तिवारी ने विधेयक पेश किये जाने का विरोध करते हुए कहा कि यह शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता का उल्लंघन और उनकी स्वतंत्रता का क्षरण करता है।
विधेयक का उद्देश्य विश्वविद्यालयों और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों को सशक्त बनाना है ताकि वे शिक्षण, अनुसंधान और नवाचार में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकें। विधेयक के अधिनियम का रूप लेने पर, यह केंद्र या राज्य के अधिनियम द्वारा स्थापित या संचालित विश्वविद्यालयों पर लागू होगा।
आरएसपी के एन. के. प्रेमचंद्रन ने विधेयक के हिंदी नाम को लेकर आपत्ति जताते हुए कहा कि दक्षिण भारत के सांसदों को इसका उच्चारण करने में दिक्कत हो रही है।
उन्होंने कहा, ‘‘दक्षिण भारत से (लोकसभा) सदस्य होने के नाते इसका उच्चारण करने में मुझे बहुत मुश्किल हो रही है’’
उन्होंने कहा कि विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक के नाम में शामिल शब्द ‘अधिष्ठान’ का अर्थ समझ में नहीं आ रहा है। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 348(बी) के अनुसार, विधेयक का आधिकारिक मूल पाठ अंग्रेजी में होगा, ‘‘लेकिन दुर्भाग्य से, मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि विधेयक का नाम किस भाषा में है...संस्कृत या हिंदी।’’
उन्होंने कहा, ‘‘विधेयक संघवाद की भावना का उल्लंघन करता है।’’
उन्होंने यह दावा भी किया कि विधेयक की प्रति उपयुक्त समय पर सांसदों को वितरित नहीं की गई।
प्रेमचंद्रन ने आरोप लगाया कि विधेयक का ‘‘मुख्य उद्देश्य और लक्ष्य केंद्र सरकार के राजनीतिक दर्शन और विचारधारा को राज्यों पर थोपना है।’’
तृणमूल कांग्रेस के सौगत रॉय ने कहा, ‘‘हमें कल देर रात विधेयक की प्रति मिली और (लोकसभा की) आज की कार्यसूची में भी इसे पेश किये जाने का उल्लेख नहीं था।’’
उन्होंने दावा किया कि संशोधित कार्यसूची भी आज दोपहर एक बजे सदस्यों को वितरित की गई। उन्होंने सवाल किया, ‘‘क्या इस तरीके से संसदीय कार्य मंत्रालय काम करेगा? जब वे विधेयक को पेश किये जाने का विरोध करने के लिए उपयुक्त गुंजाइश भी नहीं देना चाहते।’’
उन्होंने पीठासीन सभापति कृष्णा प्रसाद तेन्नेटी से इस पर ऐतिहासिक आदेश पारित करने का अनुरोध करते हुए कहा कि इस तरह से संसद नहीं चलनी चाहिए।
रॉय ने प्रधान द्वारा विधेयक पेश किये जाने का विरोध करते हुए कहा कि संसद राज्य के विश्वविद्यालयों को व्यापक रूप से अपने नियंत्रण में नहीं ले सकती। रॉय ने आरोप लगाया कि यह (विधेयक) केंद्र को केरल, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु में राज्य सरकार संचालित विश्वविद्यालयों के कामकाज में हस्तक्षेप की अनुमति देता है।
द्रमुक के टी.वी. सेल्वागणपति ने आरोप लगाया कि यह सरकार जब भी कोई कानून लाती है, तो उसमें हिंदी भाषा की शब्दावली का इस्तेमाल किया जाता है।
उन्होंने कहा कि संविधान में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह विधेयक संविधान के ‘‘संघवाद के सिद्धांत के विरूद्ध’’ है।
कांग्रेस की एस. जोतिमणि ने कहा कि वह इस विधेयक को हिंदी थोपने के तौर पर देख रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया, ‘‘यह तमिलनाडु जैसे राज्यों पर हिंदी थोपने की कोशिश है और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।’’
विपक्षी सदस्यों के शोरगुल के बीच, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने विधेयक को सदन में पेश किया।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने विपक्षी सदस्यों द्वारा विधेयक को लेकर जताई गई चिंताओं का हवाला देते हुए कहा, ‘‘कार्य मंत्रणा समिति की बैठक के दौरान कई माननीय सदस्यों ने अनुरोध किया कि यह एक व्यापक विधेयक है और हमें इस पर और चर्चा करने की जरूरत है। इसलिए, सरकार इसे संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) को भेजने का प्रस्ताव करती है।’’
उन्होंने पीठासीन सभापति से उच्च सदन और विभिन्न राजनीतिक दलों के परामर्श से जेपीसी गठित करने का आग्रह किया।
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) जैसे निकायों की जगह उच्च शिक्षा नियामक निकाय स्थापित करने वाले इस विधेयक को शुक्रवार को मंजूरी दी थी।
भाषा सुभाष