पश्चिम बंगाल: मतुआ समुदाय के प्रमुख परिवार में अंदरूनी कलह ने भाजपा के लिए असहज स्थिति पैदा की
सुभाष नरेश
- 25 Aug 2025, 07:38 PM
- Updated: 07:38 PM
कोलकाता, 25 अगस्त (भाषा) पश्चिम बंगाल में राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मतुआ समुदाय के प्रमुख परिवार का अंदरूनी कलह केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर और उनके बड़े भाई एवं भाजपा विधायक सुब्रत ठाकुर के बीच वर्चस्व की लड़ाई के रूप में खुलकर सामने आ गया है।
इस टकराव ने प्रदेश भाजपा नेतृत्व को असहज स्थिति में डाल दिया है, क्योंकि इसे लेकर वह असमंजस की स्थिति में है कि चुनावी रूप से जिस समुदाय पर वह अत्यधिक निर्भर है, उसके अंदरूनी कलह को कैसे संभाला जाए। वहीं, तृणमूल कांग्रेस इस कलह को भाजपा को घेरने के अवसर के रूप में देख रही है।
राज्य में 2026 में विधानसभा चुनाव होने हैं।
केंद्रीय मंत्री के समर्थकों द्वारा मतुआ समुदाय के केंद्र ठाकुरनगर स्थित नटमंदिर में एक शिविर आयोजित करने को लेकर रविवार को शुरू हुआ विवाद अब आरोप-प्रत्यारोप में बदल गया है।
गायघाट के विधायक सुब्रत ने आयोजन पर इस आधार पर आपत्ति जताई कि यह स्थल पारंपरिक रूप से सांस्कृतिक और धार्मिक कार्यक्रमों के लिए आरक्षित है।
इस विवाद में, दोनों पक्षों के बीच आरोप-प्रत्यारोप देखने को मिले। एक ओर जहां शांतनु के समर्थकों ने विधायक पर श्रद्धालुओं को धमकाने का आरोप लगाया, वहीं दूसरी ओर सुब्रत ने पलटवार करते हुए दावा किया कि उनके भाई सामुदायिक संस्थाओं पर एकाधिकार स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं।
शांतनु ने अपने बड़े भाई पर मंत्री पद की महत्वाकांक्षा रखने और दलबदल कर तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने के लिए प्रयासरत होने का लगाया।
वहीं, सुब्रत ने आरोप लगाया कि केंद्रीय मंत्री ठाकुर परिवार के भीतर शक्तियों पर एकाधिकार कायम कर रहे हैं और सामुदायिक स्थानों पर कब्जा कर रहे हैं।
परिवार के भीतर मतभेद अब खुल कर सामने आ गए हैं।
सुब्रत को अपनी मां छविरानी ठाकुर, चाची और तृणमूल सांसद ममताबाला ठाकुर तथा चचेरी बहन मधुपर्णा ठाकुर, जो तृणमूल कांग्रेस की विधायक हैं, का समर्थन प्राप्त है।
हालांकि, शांतनु को उनके पिता मंजुलकृष्ण ठाकुर का समर्थन प्राप्त है, जिन्होंने दिल्ली से एक वीडियो संदेश जारी कर सुब्रत के व्यवहार की निंदा की और अपने छोटे बेटे पर विश्वास जताया।
ठाकुर अखिल भारतीय मतुआ महासंघ के प्रमुख सेवादार और (तृणमूल कांग्रेस सरकार के) पूर्व मंत्री हैं।
इस टकराव ने प्रदेश भाजपा नेतृत्व को असहज स्थिति में डाल दिया है और उसने चुप्पी साध रखी है।
बनगांव संगठनात्मक जिले के एक वरिष्ठ भाजपा नेता ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘सुब्रत विधायक हैं, शांतनु केंद्रीय मंत्री हैं, दोनों हमारे लिए महत्व रखते हैं। पार्टी पारिवारिक मामले में किसी का पक्ष नहीं ले सकती। हमें उम्मीद है कि दोनों भाई इसे खुद सुलझा लेंगे।’’
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य और विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी, दोनों ने कार्यकर्ताओं को चुप रहने की कथित तौर पर सलाह दी है।
तृणमूल के एक अंदरूनी सूत्र ने इस घटनाक्रम पर चुटकी लेते हुए कहा, ‘‘भाजपा अंदर ही अंदर टूट रही है।’’
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह विवाद ठाकुरबाड़ी में आपसी प्रतिद्वंद्विता के लंबे इतिहास की प्रतिध्वनि है, जहां दशकों से गुटीय संघर्ष ने मतुआ राजनीति को प्रभावित किया है।
इससे पहले, मंजुलकृष्ण और दिवंगत कपिल कृष्ण ठाकुर के साथ-साथ उनकी चाची ममताबाला और भाइयों के बीच भी मतभेद देखने को मिले थे।
रविवार को सुब्रत ने अपने भाई पर जाति प्रमाण पत्रों और महासंघ के नाम पर जारी ‘‘मतुआ कार्ड” के वितरण में हेराफेरी करने का सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया था कि वास्तविक नामशूद्र लाभार्थियों को नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के लाभों से वंचित किया जा रहा है।
सुब्रत ने आरोप लगाया, ‘‘शांतनु राजनीतिक लाभ के लिए ऐसा कर रहे हैं। उन्होंने हरिचंद-गुरुचंद मंदिर पर कब्जा कर लिया है और एक तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं।’’
बनगांव से भाजपा सांसद शांतनु ने इन आरोपों को ‘‘राजनीतिक ईर्ष्या’’ बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि समुदाय उनके साथ मजबूती से खड़ा है।
उन्नीसवीं सदी में हरिचंद ठाकुर द्वारा स्थापित पिछड़ी जाति का हिंदू संप्रदाय, मतुआ, उत्तर 24 परगना और उससे लगे नादिया में एक महत्वपूर्ण वोट बैंक है।
भाजपा के लिए मतुआ समुदाय का समर्थन हासिल करना महत्वपूर्ण है, जिनके वोटों ने 2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर 24 परगना और नादिया के कुछ हिस्सों में पार्टी की जीत में अहम भूमिका निभाई थी।
भाजपा 2021 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में मतुआ समुदाय के अपने गढ़ को बरकरार रखने में कामयाब रही थी।
भाषा सुभाष