आईआईटी मद्रास ने जीवाणु के एंटीबायोटिक प्रतिरोधी होने का तेजी से पता लगाने वाला उपकरण विकसित किया
सुभाष सुरेश
- 25 Aug 2025, 04:11 PM
- Updated: 04:11 PM
नयी दिल्ली, 25 अगस्त (भाषा) भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), मद्रास के शोधकर्ताओं ने एक नवोन्मेषी और किफायती‘माइक्रोफ्लुइडिक’ उपकरण विकसित किया है, जो तेजी से पता लगा सकता है कि क्या जीवाणु एंटीबायोटिक दवाओं के प्रति गैर-प्रभावी हैं या संवेदनशील।
महंगी या जटिल निर्माण प्रक्रियाओं पर निर्भर या अत्यधिक दक्ष तकनीशियनों की आवश्यकता वाले कई आधुनिक तकनीकों के विपरीत यह ‘लैब-ऑन-चिप’ (लघु प्रणालियां, जो एक ही चिप पर कई प्रयोगशाला कार्यों को एकीकृत करती हैं) उपकरण एक साधारण ‘माइक्रोफ्लुइडिक’ चिप में ‘स्क्रीन-मुद्रित कार्बन इलेक्ट्रोड’ पर आधारित है।
यह दृष्टिकोण इस उपकरण को न केवल किफायती बनाता है, बल्कि छोटे क्लीनिक और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा केंद्रों में उपयोग के लिए भी उपयुक्त बनाता है।
आईआईटी, मद्रास के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के वाई बी जी वर्मा इंस्टीट्यूट के ‘चेयर प्रोफेसर’ एस पुष्पवनम के अनुसार, शीघ्रता, संवेदनशीलता और उपयोग में आसानी के लिए डिजाइन किया गया यह उपकरण जीवाणु संक्रमण के शीघ्र निदान और बेहतर उपचार की प्रबल क्षमता रखता है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां उन्नत प्रयोगशाला बुनियादी ढांचे तक सीमित पहुंच है।
यह उपकरण तीन घंटे के भीतर परिणाम दे सकता है और 'इलेक्ट्रोकेमिकल इम्पीडेंस स्पेक्ट्रोस्कोपी' पर आधारित है।
रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर) आज वैश्विक स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों के सामने सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने एएमआर को वैश्विक स्वास्थ्य के लिए शीर्ष 10 खतरों में से एक के रूप में चिह्नित किया है, और ऐसा अनुमान किया गया है कि 2019 में दुनिया भर में लगभग 40.95 लाख मौतें जीवाणु एएमआर से जुड़ी थीं।
पुष्पवनम के अनुसार, ‘‘यह जोखिम विशेष रूप से निम्न और मध्यम आय वाले देशों में अधिक है, जहां जांच सुविधाएं अपर्याप्त हैं और संक्रमण अक्सर बिना उपचार के रह जाते हैं या मरीज की देखभाल ठीक से नहीं की जाती है।’’
इस समस्या के समाधान के लिए, आईआईटी मद्रास की टीम ने कम लागत वाला ‘फेनोटाइपिक परीक्षण’ उपकरण विकसित किया है, जो जीवाणु वृद्धि और एंटीबायोटिक संवेदनशीलता का आकलन करने के लिए विद्युत रासायनिक संकेतों का उपयोग करता है।
पुष्पवनम ने कहा, ‘‘फिलहाल, हम आईआईटी-एम इंस्टीट्यूट हॉस्पिटल के साथ मिलकर नैदानिक सत्यापन कर रहे हैं। इसके बाद, हम अपने स्टार्टअप, काप्पन एनालिटिक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से इसका व्यावसायीकरण करने की योजना बना रहे हैं।’’
शोधकर्ताओं ने इस उपकरण का परीक्षण दो प्रकार के जीवाणुओं, ग्राम-नेगेटिव ई कोलाई और ग्राम-पॉजिटिव बी सबटिलिस पर किया है।
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