न्यायालय ने 2020 से राज्यपालों के पास लंबित विधेयकों पर केंद्र और अटॉर्नी जनरल से सवाल किए
संतोष दिलीप
- 19 Aug 2025, 10:50 PM
- Updated: 10:50 PM
नयी दिल्ली, 19 अगस्त (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने मंगलवार को केंद्र सरकार और अटॉर्नी जनरल से राज्यपालों के पास लंबे समय से लंबित उन विधेयकों के बारे में सवाल किए, जो राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित किए जा चुके हैं।
न्यायालय ने उस स्थिति में संवैधानिक न्यायालयों की सीमाओं को किया, जब कोई विधेयक साल 2020 से लंबित पड़ा हो। यह सवाल प्रधान न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने राष्ट्रपति द्वारा मांगे गए परामर्श पर सुनवाई के दौरान किया।
इस सुनवाई का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए क्या राज्यपालों और राष्ट्रपति पर कोई निश्चित समय-सीमा लागू की जा सकती है या नहीं।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा और न्यायमूर्ति ए एस चंदुरकर की सदस्यता वाली पीठ ने कहा कि वह केवल कानून पर ही अपने विचार व्यक्त करेगी। पीठ ने कहा कि वह तमिलनाडु मामले में आठ अप्रैल के फैसले पर कोई राय नहीं व्यक्त करेगी, जिसमें राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर कार्रवाई के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए समयसीमा तय की गई थी।
राष्ट्रपति द्वारा मांगे गए परामर्श की विचारणीयता पर तमिलनाडु और केरल सरकार द्वारा उठाई गई प्रारंभिक आपत्तियों का जवाब देते हुए, पीठ ने कहा कि वह अपने परामर्शी क्षेत्राधिकार का प्रयोग करेगी, क्योंकि वह अपीलीय क्षेत्राधिकार में नहीं बैठी है।
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी, जिनकी सहायता शीर्ष अदालत ने मांगी थी, ने कहा कि अदालतें संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी पूर्ण शक्ति का प्रयोग करके राज्यपाल के पास लंबित विधेयकों को पारित नहीं मान सकतीं।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने वेंकटरमणी से पूछा कि क्या 2020 से तमिलनाडु के राज्यपाल के समक्ष विधेयक लंबित थे। अटॉर्नी जनरल ने कहा कि ये तथ्य अदालत के समक्ष नहीं हैं और अदालत को अपने समक्ष लंबित विषय का परीक्षण करना है।
उन्होंने कहा, ‘‘अदालत को कानून देखना होगा कि क्या ऐसा आदेश पारित किया जा सकता है। अगर यह तथ्यात्मक रूप से सही भी हो...तो भी इसके लिए स्पष्टीकरण दिए गए थे। इस बात का स्पष्टीकरण भी दिया गया था कि राज्यपाल ने विधेयकों को लंबित क्यों रखा। हम इस शक्ति पर चर्चा कर रहे हैं कि क्या अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करके विधेयकों को पारित किया गया समझा जा सकता है।’’
हालांकि, पीठ ने उनसे पूछा, ‘‘आप हमें इस बारे में क्या बता सकते हैं कि अगर एक संवैधानिक अदालत को ऐसे तथ्यों (जहां 2020 में विधानसभा द्वारा पारित विधेयक लंबित थे) से निपटना पड़े, तो वह क्या करेगी? अगर आपके अनुसार अदालत ने गलती की, तो इस स्थिति से निपटने के लिए संवैधानिक रूप से स्वीकार्य तरीका क्या है?’’
प्रधान न्यायाधीश और न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने 15 अप्रैल के फैसले के कुछ पैराग्राफ का हवाला देते हुए वेंकटरमणी से भी सवाल किए, जिनमें संविधान के अनुच्छेद 142 को लागू करने के कारणों का ज़िक्र था।
न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने पूछा, ‘‘जरा देखिए कि स्थिति कितनी विकट हो गई थी... इसी स्थिति को सुधारने के लिए अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा। ये विधेयक इतने लंबे समय से लंबित थे। अदालत के पास क्या विकल्प था?’’
वेंकटरमणी ने कहा कि एक बार अदालत इस क्षेत्र में प्रवेश कर जाए, तो उससे किसी भी ‘दिमाग हिला देने वाले तथ्य’ पर विचार करने के लिए कहा जाएगा, लेकिन सवाल यह है कि ‘क्या अदालत इस क्षेत्र में प्रवेश कर सकती है?’
केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि ये सवाल पहली बार देश के सामने आए हैं और उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि वह अलग-अलग मामलों के तथ्यों में न जाए।
इससे पहले सुनवाई के दौरान, तमिलनाडु और केरल सरकारों द्वारा उठाई गई प्रारंभिक आपत्तियों का जवाब देते हुए मेहता ने कहा कि शीर्ष अदालत के पास अपने फैसलों को पलटने की एक अंतर्निहित शक्ति है, जो किसी भी अपीलीय शक्ति का हिस्सा नहीं है।
मेहता ने कहा, ‘‘यह पहली बार है, जब राष्ट्रपति को लगा कि कोई अधिकृत निर्णय न होने के कारण कार्यात्मक असंगति पैदा हुई है और पैदा होगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि दो न्यायाधीशों की पीठ ने किसी अन्य प्राधिकारी के लिए समय-सीमा तय कर दी है। यह एक संवैधानिक समस्या है - राज्यपाल और राष्ट्रपति कैसे कार्य करेंगे... कार्यपालिका का प्रधान मार्गदर्शन मांग रहा है, इस फैसले ने एक संवैधानिक समस्या पैदा कर दी है।’’
तमिलनाडु और केरल की ओर से विधेयक की समयसीमा पर राष्ट्रपति के परामर्श मांगने का विरोध करने पर उच्चतम न्यायालय ने पूछा कि उन्हें समस्या क्या है?
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अगर राष्ट्रपति स्वयं परामर्श मांगती हैं कि क्या राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर कार्रवाई के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति पर निश्चित समय-सीमा थोपी जा सकती है या नहीं, तो इसमें क्या गलत है?
भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) बी आर गवई की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह सवाल तब उठाया जब तमिलनाडु और केरल सरकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने ‘राष्ट्रपति के परामर्श’ की विचारणीयता पर ही सवाल उठाया। दोनों दक्षिणी राज्यों में गैर-भाजपा दलों का शासन है।
पीठ ने महत्वपूर्ण सुनवाई शुरू करते हुए पूछा, ‘‘जब माननीय राष्ट्रपति स्वयं परामर्श मांग रहे हैं, तो समस्या क्या है... क्या आप सचमुच इसका विरोध करने के लिए गंभीर हैं?’’
पीठ ने कहा, ‘‘यह बिल्कुल स्पष्ट है कि हम परामर्शी अधिकार क्षेत्र में बैठे हैं।’’
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मई में संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए शीर्ष अदालत से यह जानने का प्रयास किया था कि क्या राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर विचार करते समय राष्ट्रपति द्वारा विवेकाधिकार का प्रयोग करने के लिए न्यायिक आदेशों द्वारा समय-सीमाएं निर्धारित की जा सकती हैं।
केंद्र ने अपनी लिखित दलील में कहा है कि राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर कार्रवाई के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए निश्चित समय-सीमा निर्धारित करना, सरकार के एक अंग द्वारा ऐसा अधिकार अपने हाथ में लेना होगा, जो संविधान ने उसे प्रदान नहीं किया है और इससे ‘‘संवैधानिक अव्यवस्था’’ पैदा हो सकती है।
केरल सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता के. के. वेणुगोपाल ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 के संबंध में इसी प्रकार के प्रश्नों की व्याख्या शीर्ष अदालत पंजाब, तेलंगाना और तमिलनाडु से संबंधित मामलों में पहले ही कर चुकी है, जिसके तहत राज्यपालों के लिये राज्य के विधेयकों पर ‘‘यथाशीघ्र’’ कार्रवाई करना आवश्यक होता है।
उच्चतम न्यायालय के कई फैसलों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल की शक्तियों की उच्चतम न्यायालय द्वारा बार-बार व्याख्या की गई है और तमिलनाडु (राज्य बनाम राज्यपाल) मामले में यह पहली बार है कि विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को मंजूरी देने के लिए कोई समय सीमा तय की गई है।
उन्होंने दलील दी, ‘‘ऐसा नहीं है कि इन मुद्दों पर निर्णय नहीं हुआ है। एक बार जब फैसले में इन विषयों को शामिल किया जा चुका है, तो राष्ट्रपति के नए सिरे से परामर्श मांगने पर विचार नहीं किया जा सकता।’’
उन्होंने कहा कि भारत सरकार को राष्ट्रपति के जरिये परामर्श प्राप्त करने के लिए अनुच्छेद 143 का सहारा लेने के बजाय औपचारिक समीक्षा की मांग करनी चाहिए थी।
वेणुगोपाल ने यह भी कहा कि राष्ट्रपति अनुच्छेद 74 के तहत मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से बंधे हैं, जिससे विवेकाधिकार की बहुत कम गुंजाइश बचती है।
उन्होंने दलील दी कि ‘‘वास्तव में, यह राष्ट्रपति का परामर्श मांगना नहीं, बल्कि सरकार का परामर्श मांगना है’’ और कहा कि ‘‘यह मुद्दा कई फैसलों के माध्यम से पहले ही स्पष्ट किया जा चुका है’’।
तमिलनाडु सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक सिंघवी ने कहा कि अनुच्छेद 143 के तहत परामर्श मांग कर ‘‘प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अंत: न्यायालयी (इंट्रा कोर्ट) अपील’’ नहीं की जा सकती।
सिंघवी ने कहा, ‘‘इस अदालत से दो अलग-अलग पक्षों के बीच एक फैसले की विषय-वस्तु और सार को बदलने के लिए कहा जा रहा है और यह संस्थागत अखंडता का हनन है... यह एक अपील ही है, चाहे आप इसे कितनी भी खूबसूरती से छुपा लें।’’
न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने कहा, ‘‘निर्णयात्मक फैसला पूरी तरह से ठोस आधार पर आधारित होता है, न कि सिर्फ परामर्शी आधार पर।’’
प्रधान न्यायाधीश ने पूछा, ‘‘हमें एक भी ऐसा फैसला बताइए, जहां खंडपीठ में संदर्भ स्वीकार्य नहीं रहा है। हम इस मुद्दे पर फैसला नहीं कर रहे हैं कि तमिलनाडु सही है या नहीं।’’
शुरुआत में प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि पीठ पहले संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत परामर्श की विचारणीयता पर आपत्तियों का विश्लेषण करेगी।
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने वेणुगोपाल और सिंघवी की दलीलों का विरोध किया।
शीर्ष अदालत ने 22 जुलाई को कहा था कि राष्ट्रपति के परामर्श में उठाए गए मुद्दे ‘‘पूरे देश’’ को प्रभावित करेंगे।
राष्ट्रपति का यह निर्णय तमिलनाडु सरकार द्वारा पारित विधेयकों से निपटने में राज्यपाल की शक्तियों पर उच्चतम न्यायालय के आठ अप्रैल के फैसले के आलोक में आया है।
इस फैसले में पहली बार यह प्रावधान किया गया था कि राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा उनके विचारार्थ रखे गए विधेयकों पर संदर्भ प्राप्त होने की तिथि से तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा।
पांच पृष्ठों के परामर्श में राष्ट्रपति मुर्मू ने उच्चतम न्यायालय से 14 प्रश्न पूछे और राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयकों पर विचार करने में अनुच्छेद 200 और 201 के तहत राज्यपाल और राष्ट्रपति की शक्तियों पर उसकी राय जानने की कोशिश की।
फैसले में सभी राज्यपालों के लिए राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर कार्रवाई करने की समय-सीमा तय की गई है और यह व्यवस्था दी गई है कि अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल किसी भी विधेयक पर अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल नहीं करेंगे, बल्कि उन्हें मंत्रिपरिषद की सलाह का पालन करना अनिवार्य है।
फैसले के अनुसार, अगर राज्यपाल द्वारा विचारार्थ भेजे गए किसी विधेयक पर राष्ट्रपति से उनकी स्वीकृति नहीं मिलती है, तो राज्य सरकारें सीधे उच्चतम न्यायालय का रुख कर सकती हैं।
भाषा संतोष