सरकार ने जातिगत गणना के साथ जनगणना के कार्यक्रम की घोषणा की
धीरज सुरेश
- 04 Jun 2025, 09:30 PM
- Updated: 09:30 PM
नयी दिल्ली, चार जून (भाषा) लद्दाख जैसे बर्फीले क्षेत्रों में जातिगत गणना के साथ जनगणना की संदर्भ तिथि एक अक्टूबर, 2026 को होगी, जबकि बाकी देश में इस प्रक्रिया की संदर्भ तिथि एक मार्च, 2027 से होगी। गृह मंत्रालय ने बुधवार को यह जानकारी दी।
मंत्रालय ने एक विज्ञप्ति में बताया, ‘‘जातिगत गणना के साथ-साथ जनगणना-2027 को दो चरणों में आयोजित करने का निर्णय लिया गया है।’’
इसमें कहा गया, ‘‘जनगणना- 2027 के लिए संदर्भ तिथि मार्च 2027 के प्रथम दिन 00:00 बजे होगी।’’
इसमें कहा गया, ‘‘केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड राज्यों के बर्फीले क्षेत्रों के लिए संदर्भ तिथि 2026 के पहले अक्टूबर की आधी रात बारह बजे होगी।’’
विज्ञप्ति में कहा गया, ‘‘जनगणना अधिनियम, 1948 की धारा-तीन के प्रावधान के अनुसार उपरोक्त संदर्भ तिथियों के साथ जनगणना कराने के आशय की अधिसूचना संभवतः 16 जून 2025 को आधिकारिक राजपत्र में प्रकाशित की जाएगी।’’
अधिकारियों ने बताया कि जनगणना का दूसरा और अंतिम चरण फरवरी 2027 में शुरू होगा और एक मार्च 2027 (संदर्भ तिथि) को समाप्त होगा।
हालांकि, तत्काल स्पष्ट नहीं किया गया है कि राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को अद्यतन करने की प्रक्रिया जनगणना के साथ ही की जाएगी या नहीं। सरकार 2020 में जनगणना के साथ ही एनपीआर की योजना बना रही थी, लेकिन कोविड-19 महामारी के कारण इसे स्थगित कर दिया गया था।
भारत की जनगणना, जनगणना अधिनियम, 1948 और जनगणना नियम, 1990 के प्रावधानों के अंतर्गत की जाती है।
भारत की पिछली जनगणना 2011 में दो चरणों में की गई थी। इसमें जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बर्फ वाले इलाके को छोड़कर पहला चरण एक अप्रैल से 30 सितंबर 2020 के बीच चला था, जिसमें मकानों की गिनती की गई थी और दूसरा चरण नौ फरवरी से 28 फरवरी 2011 के बीच तक चला था, जिसमें लोगों की गिनती की गई थी। इस दौरान संदर्भ तिथि एक मार्च 2011 रखी गई थी। वहीं बर्फ वाले इलाके के लिए संदर्भ तिथि एक अक्टूबर 2010 थी।
मंत्रालय ने बताया कि जनगणना 2021 को भी इसी तरह दो चरणों में आयोजित करने का प्रस्ताव था। पहला चरण अप्रैल-सितंबर 2020 के दौरान और दूसरा चरण फरवरी 2021 में आयोजित किया जाना था।
इसमें कहा गया कि 2021 में आयोजित की जाने वाली जनगणना के पहले चरण की सभी तैयारियां पूरी हो गई थीं और एक अप्रैल, 2020 से कुछ राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में क्षेत्रीय कार्य शुरू होने वाला था। हालांकि, देश भर में कोविड-19 महामारी के प्रकोप के कारण जनगणना का काम स्थगित करना पड़ा।
सरकार ने हाल ही में फैसला किया है कि वह जनगणना के साथ-साथ जातिगत गणना भी कराएगी। यह पहली डिजिटल जनगणना होगी, जिसमें नागरिकों को स्वयं अपनी गिनती कराने का मौका मिलेगा।
संपूर्ण जनगणना प्रक्रिया पर सरकार को 13,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने की संभावना है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल की 24 दिसंबर, 2019 को हुई बैठक में 8,754.23 करोड़ रुपये की लागत से भारत की जनगणना 2021 कराने और 3,941.35 करोड़ रुपये की लागत से एनपीआर को अद्यतन करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी।
हालांकि, केंद्र सरकार द्वारा वित्तवर्ष 2025-26 के लिए तैयार बजट में जनगणना सर्वेक्षण और सांख्यिकी/भारत के रजिस्ट्रार जनरल (आरजीआई) के लिए महज 574.80 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
सरकारी अधिकारी ने बताया कि बजट एक छोटा मुद्दा है और इसे बिना किसी बाधा के सुलझाया जा सकता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में 30 अप्रैल को राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की बैठक में आगामी जनगणना में जातिगत गणना को भी शामिल करने का निर्णय लिया।
संविधान के अनुच्छेद 246 के अनुसार, जनगणना सातवीं अनुसूची में संघ सूची में 69वें स्थान पर सूचीबद्ध विषय है।
स्वतंत्रता के बाद संपन्न सभी जनगणना प्रक्रिया में जातिगत गणना को बाहर रखा गया था।
तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2010 में लोकसभा को आश्वासन दिया था कि जातिगत गणना के मामले पर मंत्रिमंडल में विचार किया जाएगा।
इस विषय पर विचार-विमर्श के लिए मंत्रियों का एक समूह बनाया गया था और अधिकांश राजनीतिक दलों ने जातिगत गणना कराने की सिफारिश की थी। हालांकि, कांग्रेस के नेतृत्व वाली पूर्ववर्ती संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने जातिगत गणना के बजाय सामाजिक-आर्थिक और जातिगत गणना (एसईसीसी) के नाम से सर्वेक्षण का विकल्प चुना।
महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त कार्यालय ने नागरिकों से पूछे जाने वाले लगभग तीन दर्जन प्रश्न तैयार किए थे।
भाषा धीरज