दिल्ली उच्च न्यायालय मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की संख्या बढ़ाने के अनुरोध पर विचार करेगा
पारुल नरेश
- 09 Apr 2025, 06:30 PM
- Updated: 06:30 PM
नयी दिल्ली, नौ अप्रैल (भाषा) दिल्ली उच्च न्यायालय ने बुधवार को कहा कि दिल्ली सरकार के मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की संख्या बढ़ाने के अनुरोध वाली जनहित याचिका पर विचार किए जाने की जरूरत है।
मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से कई सवाल पूछे और मामले की अगली सुनवाई के लिए 28 जुलाई की तारीख निर्धारित की।
याचिका में दलील दी गई है कि दिल्ली सरकार के पास 38 विभाग हैं और विधानसभा में 70 विधायक होने के बावजूद सरकार चलाने का जिम्मा केवल सात मंत्रियों पर है।
याचिकाकर्ता आकाश गोयल ने कहा है, “यह किसी भी राज्य में मंत्रियों की सबसे कम संख्या है। दिल्ली के बाद गोवा और सिक्किम का स्थान आता है, जहां क्रमशः 40 और 32 विधायक हैं, जबकि सरकार चलाने का जिम्मा 12-12 मंत्रियों पर है। सभी राज्यों और केंद्र-शासित प्रदेशों में दिल्ली का एक अलग दर्जा है।”
अधिवक्ता कुमार उत्कर्ष के माध्यम से दाखिल याचिका में भारतीय संविधान के अनुच्छेद-239एए को भी चुनौती दी गई है, जो दिल्ली में मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की संख्या को विधानसभा के कुल सदस्यों के मात्र 10 फीसदी तक सीमित करता है।
याचिका में कहा गया है कि यह सीमा मनमानी, भेदभावपूर्ण एवं संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन है और विशेष रूप से संघवाद, लोकतांत्रिक शासन तथा प्रशासनिक दक्षता के सिद्धांतों को कमजोर करती है।
याचिका में दावा किया गया है कि दिल्ली अन्य केंद्र-शासित प्रदेशों के समान नहीं है और अनुच्छेद-239एए के आधार पर इसे अनूठा और खास दर्जा दिया गया है, जो इसे अन्य केंद्र-शासित प्रदेशों से अलग करता है।
उच्च न्यायालय ने कहा कि दिल्ली की तुलना अन्य राज्यों से नहीं की जा सकती, क्योंकि इसे विशेष संवैधानिक व्यवस्था के तहत ‘स्वतंत्र’ दर्जा हासिल है और इसका शासन अलग तरीके से चलता है।
उसने कहा, “अगर दिल्ली का दर्जा एक स्वतंत्र राज्य के तौर पर बरकरार रखा गया है, तो आप इसकी तुलना दूसरे राज्यों से कैसे कर सकते हैं? संवैधानिक व्यवस्था के तहत दिल्ली का शासन दूसरे राज्यों के शासन से अलग है। यहां केंद्र और शहर की सरकार के बीच शक्तियों का बंटवारा है, यहां तक कि उन विषयों पर भी जो विशेष रूप से राज्य सूची में हैं। अन्य राज्यों के मामले में ऐसा नहीं है।”
भाषा पारुल