न्यायालय ने रिश्तों में खटास आने पर आपराधिक मामले दर्ज करने की 'बढ़ती प्रवृत्ति' को चिह्नित किया
सुरेश माधव
- 07 Apr 2025, 09:34 PM
- Updated: 09:34 PM
नयी दिल्ली, सात अप्रैल (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को कहा कि विवाह की संभावना की प्रत्याशा में सहमति से बने हर रिश्ते को विवाद की स्थिति में ‘‘शादी करने के झूठे बहाने’’ का रंग नहीं दिया जा सकता।
न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने रिश्तों में खटास आने पर आपराधिक मुकदमा दायर करने की "बढ़ती प्रवृत्ति" का संज्ञान लिया।
इसमें कहा गया, ‘‘हमें लगता है कि रिश्तों में खटास आने पर आपराधिक मुकदमा शुरू करने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। सहमति से बने हर रिश्ते, जिसमें विवाह की संभावना हो सकती है, उसे विवाद की स्थिति में ‘शादी करने के झूठे बहाने’ का रंग नहीं दिया जा सकता।’’
शीर्ष अदालत ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के उस आदेश को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की, जिसमें बलात्कार के कथित अपराध के लिए 2015 में दर्ज प्राथमिकी में एक पूर्व न्यायिक अधिकारी को आरोपमुक्त करने से इनकार कर दिया गया था।
पूर्व न्यायिक अधिकारी ने शीर्ष अदालत के समक्ष अपील दायर की थी। संबंधित अधिकारी कलकत्ता की एक दीवानी अदालत में न्यायाधीश (वरिष्ठ प्रभाग) के पद से सेवानिवृत्त हुआ था।
शिकायतकर्ता ने एक प्राथमिकी दर्ज कराई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि 2014 में अपने पूर्व पति के साथ वैवाहिक कलह से उत्पन्न मुकदमे के लंबित रहने के दौरान वह अपीलकर्ता (संबंधित न्यायिक अधिकारी) के संपर्क में आई। अपीलकर्ता अपनी पत्नी से अलग हो चुका था।
उसने आरोप लगाया कि अपीलकर्ता ने आश्वासन दिया था कि वह उससे शादी करेगा और तलाक के बाद उसकी एवं उसके पहले विवाह से हुए बेटे की पूरी जिम्मेदारी लेगा।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि जब उसका तलाक हो गया, तो अपीलकर्ता ने उससे संपर्क न करने के लिए कहा और उसे टालना शुरू कर दिया।
पीठ ने कहा कि भले ही प्राथमिकी और आरोपपत्र में आरोपों को सच मान लिया जाए, लेकिन यह असंभव है कि शिकायतकर्ता ने केवल शादी के आश्वासन के कारण अपीलकर्ता के साथ शारीरिक संबंध बनाए हों।
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘मामले के तथ्यात्मक सांचे (मैट्रिक्स) पर विचार करने के बाद यह स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता और अपीलकर्ता के बीच शारीरिक संबंध सहमति से बने थे और इसे उसकी सहमति के बिना या उसकी इच्छा के विरुद्ध बनाया गया संबंध नहीं कहा जा सकता है।’’
इसने कहा कि भले ही शारीरिक संबंध को शादी के प्रस्ताव पर आधारित माना जाता हो, लेकिन महिला "तथ्य की गलत धारणा" या "शादी करने के झूठे बहाने पर बलात्कार" का तर्क नहीं दे सकती।
फैसले में कहा गया है, ‘‘पहले दिन से ही उसे (महिला को) इस तथ्य का ज्ञान था और वह इस तथ्य से अवगत थी कि अपीलकर्ता वैवाहिक जीवन में था। यह बात और है कि वह (अपीलकर्ता पत्नी से) अलग हो गया था।’’
पीठ ने कहा कि कोई यह दलील दे सकता है कि अपीलकर्ता प्रभाव डालने की शक्ति की स्थिति में था, हालांकि, "बहलाने" या "फुसलाने" को स्थापित करने के लिए रिकॉर्ड पर कुछ भी नहीं था।
न्यायालय ने कहा कि इस तरह की मुकदमेबाजी कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
इसलिए, शीर्ष अदालत ने ‘‘न्याय की खातिर’’ मुकदमे को समाप्त करने का फैसला किया। पीठ ने अपील स्वीकार करते हुए उच्च न्यायालय के फरवरी 2024 के आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि अपीलकर्ता को जनवरी 2016 में उच्च न्यायालय द्वारा अग्रिम जमानत दी गई थी।
भाषा सुरेश