मधुमिता हत्याकांड: न्यायालय ने दोषी की सजा कटौती याचिका पर विचार के लिए समय सीमा तय की
सुभाष संतोष
- 01 Feb 2025, 09:04 PM
- Updated: 09:04 PM
नयी दिल्ली, एक फरवरी (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने कवयित्री मधुमिता शुक्ला हत्याकांड के एक दोषी की सजा में कटौती करने की याचिका पर विचार करने के वास्ते उत्तराखंड सरकार के लिए समयसीमा तय की है और कहा कि देरी होने पर उसकी जमानत याचिका पर विचार किया जाएगा।
शुक्ला की 9 मई, 2003 को लखनऊ के पेपर मिल कॉलोनी में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। वह गर्भवती थीं।
शुक्ला की हत्या के सिलसिले में सितंबर 2003 में उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी को गिरफ्तार किया गया था, जिनके साथ वह कथित तौर पर ‘रिलेशनशिप’ में थीं।
इसके बाद, शुक्ला की हत्या की साजिश के सिलसिले में अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार किया गया। मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने की और उत्तराखंड की अदालत में मुकदमा चला, जहां दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
न्यायमूर्ति अभय एस ओका और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने पूर्व में कहा था कि दोषी रोहित चतुर्वेदी की सजा में कटौती के मामले पर विचार करने के लिए उपयुक्त राज्य सरकार उत्तराखंड सरकार है। पीठ ने समय से पूर्व रिहाई के लिए मामले की पड़ताल कर रही समिति को राज्य सरकार के समक्ष अपनी सिफारिश सौंपने के लिए एक सप्ताह का समय दिया है।
पीठ ने कहा, ‘‘हम निर्देश देते हैं कि राज्य स्तरीय समिति की सिफारिश आज से अधिकतम एक सप्ताह के भीतर राज्य सरकार को सौंपी जाए और उसके बाद दो सप्ताह के भीतर राज्य सरकार उपयुक्त कदम उठाएगी।’’
न्यायालय ने कहा कि उत्तराखंड सरकार निर्णय लेने के तीन दिनों के भीतर केंद्र सरकार की सहमति के लिए उसे अपना निर्णय भेजेगी।
पीठ ने कहा, ‘‘केंद्र सरकार का उपयुक्त प्राधिकार राज्य सरकार की सिफारिश प्राप्त होने के एक महीने के भीतर उपयुक्त निर्णय लेगा।’’ साथ ही, इसने मामले को 28 मार्च के लिए सूचीबद्ध कर दिया।
न्यायालय ने स्पष्ट किया, ‘‘यदि हम पाते हैं कि 28 मार्च को निर्णय लेने की प्रक्रिया में देरी हो रही है, तो हम अंतरिम जमानत देने के याचिकाकर्ता के अनुरोध पर विचार करेंगे।’’
सुनवाई की शुरुआत होने पर, चतुर्वेदी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एन हरिहरन ने बताया कि दोषी 25 साल से अधिक समय से जेल में है और यदि प्रक्रिया में देरी होती है तो उसके मामले में अंतरिम जमानत पर विचार किया जाना चाहिए।
शीर्ष अदालत ने दो दिसंबर को कहा था कि बिलकिस बानो मामले में शीर्ष अदालत का 13 मई 2022 का फैसला, जिसमें कहा गया था कि जिस राज्य में अपराध हुआ है, वहां की सरकार सजा में कटौती पर विचार करने के लिए उपयुक्त होगी, अब कानून नहीं है।
शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘राधेश्याम भगवानदास शाह उर्फ लाला वकील बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य (2022 फैसला) मामले में इस न्यायालय का फैसला अब अच्छा कानून नहीं है।’’
न्यायालय ने कहा, ‘‘इसलिए, रिट याचिका में, इस न्यायालय द्वारा पारित 15 दिसंबर 2023 का आदेश, जो उक्त निर्णय पर आधारित था, वापस लिया जाता है और रिट याचिका को उसकी मूल संख्या पर बहाल किया जाता है।’’
उत्तर प्रदेश सरकार, जिसे चतुर्वेदी की सजा कटौती याचिका पर विचार करने के लिए कहा गया था, ने बिलकिस बानो मामले में 8 जनवरी 2024 और 13 मई 2022 को पारित शीर्ष अदालत के पूर्व के फैसलों का हवाला दिया था और कहा था कि इस (शुक्ला) मामले में सक्षम प्राधिकार उत्तराखंड सरकार होगी।
उत्तर प्रदेश सरकार ने 15 दिसंबर 2023 के आदेश को वापस लेने का अनुरोध किया था, जिसमें चतुर्वेदी की समयपूर्व रिहाई पर विचार करने को कहा गया था।
वर्तमान मामले में, 15 दिसंबर 2023 को उच्चतम न्यायालय की एक अन्य पीठ, जो 13 मई 2022 के फैसले पर निर्भर थी, ने उत्तर प्रदेश सरकार से चतुर्वेदी की सजा कटौती याचिका पर विचार करने को कहा, जिस पर उत्तराखंड की एक अदालत में हत्या का मुकदमा चलाया गया था।
उत्तराखंड की एक निचली अदालत ने 24 अक्टूबर, 2007 को अमरमणि त्रिपाठी, उनकी पत्नी मधुमणि त्रिपाठी, भतीजे रोहित चतुर्वेदी और सहयोगी संतोष कुमार राय को शुक्ला की हत्या के लिए दोषी करार दिया और उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
नौतनवा विधानसभा क्षेत्र से चुने गए अमरमणि त्रिपाठी 2001 में उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार और 2002 में बसपा सरकार में मंत्री रहे। वह समाजवादी पार्टी से भी जुड़े रहे हैं।
सत्रह जून 2003 को मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई। आठ फरवरी 2007 को शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड स्थानांतरित कर दी।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने 16 जुलाई, 2012 को उनकी दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा। उच्चतम न्यायालय ने 19 नवंबर 2013 को भी इस आदेश को बरकरार रखा।
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