न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 32 वर्षीय व्यक्ति को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी
शफीक
- 11 Mar 2026, 07:59 PM
- Updated: 07:59 PM
नयी दिल्ली, 11 मार्च (भाषा) उच्चतम न्यायालय ने निष्क्रिय इच्छामृत्यु (पैसिव युथनेसिया) की पहली बार स्वीकृति देते हुए 32 वर्षीय उस व्यक्ति की कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की बुधवार को अनुमति दे दी जो 12 साल से अधिक समय से कोमा में है।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु का अर्थ है कि नाजुक स्थिति वाले किसी मरीज को जीवित रखने वाली चिकित्सा सहायता को रोकने या जीवन रक्षक प्रणाली को हटाने की अनुमति देना ताकि उसकी स्वाभाविक रूप से मौत हो सके।
इस फैसले के साथ ही न्यायालय ने केंद्र सरकार से निष्क्रिय इच्छामृत्यु पर एक व्यापक कानून बनाने पर विचार करने का आग्रह किया ताकि इससे ''उन मामलों में स्पष्टता मिलेगी जो बेहद व्यावहारिक और भावनात्मक रूप से संवेदनशील हैं।''
न्यायालय ने कहा कि कानून के अभाव के कारण, उसे हस्तक्षेप करने और दिशानिर्देश देने के लिए विवश होना पड़ा क्योंकि यह संस्थागत वरीयता का मामला नहीं बल्कि संवैधानिक आवश्यकता का मामला है, ताकि मौलिक अधिकारों की शुचिता, विशेष रूप से गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार की रक्षा की जा सके।
गाजियाबाद निवासी हरीश राणा 2013 में एक इमारत की चौथी मंजिल से गिरने के कारण सिर में चोट लगने से घायल हो गया था और वह एक दशक से अधिक समय से कोमा में है। वह पंजाब विश्वविद्यालय का छात्र था।
न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति के वी विश्वनाथन की पीठ ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को राणा को उपशामक देखभाल इकाई में भर्ती करने का निर्देश दिया ताकि चिकित्सकीय उपचार बंद किया जा सके। पीठ ने यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि उपचार एक सुनियोजित तरीके से बंद किया जाए ताकि गरिमा बनी रहे।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति देने वाला यह आदेश 2023 में संशोधित किए गए 2018 के उस फैसले के अनुरूप है जिसमें गरिमा के साथ मृत्यु के मौलिक अधिकार को मान्यता दी गई थी।
उच्चतम न्यायालय ने इससे पहले 32 वर्षीय व्यक्ति के माता-पिता से मिलने की इच्छा जताई थी। उसने दिल्ली एम्स के चिकित्सकों के द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड द्वारा दाखिल की गई राणा की चिकित्सा संबंधी रिपोर्ट का अवलोकन किया था और कहा था कि यह रिपोर्ट ''दुखद'' है।
प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड ने मरीज की स्थिति की जांच करने के बाद कहा था कि उसके ठीक होने की संभावना नगण्य है।
उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल 11 दिसंबर को कहा था कि प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार यह व्यक्ति ''बेहद दयनीय स्थिति'' में है।
उच्चतम न्यायालय द्वारा 2023 में जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, कोमा की स्थिति वाले मरीज की कृत्रिम जीवन रक्षक प्रणाली हटाने को लेकर विशेषज्ञों की राय लेने के लिए एक प्राथमिक और एक द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड का गठन करना अनिवार्य है।
भाषा शफीक नरेश
नरेश
शफीक
1103 1959 दिल्ली