एक-दो आपराधिक मामलों के आधार पर व्यक्ति गुंडा नहीं: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
धीरज
- 23 Apr 2026, 10:39 PM
- Updated: 10:39 PM
प्रयागराज, 23 अप्रैल (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक मामले में कहा है कि महज एक या दो आपराधिक मामलों के आधार पर व्यक्ति को उप्र गुंडा नियंत्रण अधिनियम, 1970 के तहत "गुंडा" के तौर पर प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
बुलंदशहर जिले के अधिकारियों ने व्यक्ति को छह माह के लिए जिले से निर्वासित करने का आदेश दिया था। इस आदेश को मेरठ मंडल के आयुक्त ने भी बकरार रखा था जिसके बाद व्यक्ति ने उच्च न्यायालय का रुख किया।
अदालत ने निर्वासन आदेश रद्द करते हुए कहा कि राज्य सरकार की इस तरह की दंडात्मक कार्रवाई से एक व्यक्ति और उसके परिवार की प्रतिष्ठा को अपूर्णीय क्षति होती है।
न्यायमूर्ति संदीप जैन ने सतेंद्र नाम के व्यक्ति द्वारा दायर याचिका स्वीकार करते हुए 12 फरवरी, 2025 को अपर जिला मजिस्ट्रेट (वित्त एवं राजस्व) द्वारा जारी आदेश को रद्द कर दिया जिसके तहत याचिकाकर्ता को छह माह के लिए जिला बदर किया गया था।
गुंडा अधिनियम के तहत यह कार्यवाही याचिकाकर्ता के खिलाफ दो आपराधिक मामलों के आधार पर शुरू की गई थी। ये आपराधिक मामले भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और एससी-एसटी अधिनियम की विभिन्न धाराओं में दर्ज किए गए थे।
अधिकारियों का मानना था कि याचिकाकर्ता आदतन अपराधी है जिससे समाज को खतरा है तथा उसकी गतिविधियों से क्षेत्र में भय और आतंक का माहौल बना है, जिसकी वजह से लोग उसके खिलाफ गवाही देने से बच रहे हैं।
सुनवाई के दौरान, याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि अलग अलग घटनाओं से आदत सामने नहीं आती।
वहीं राज्य सरकार के वकील ने दलील दी कि विभिन्न आपराधिक मामलों में याचिकाकर्ता की संलिप्तता से आपराधिक गतिविधि में संलिप्त होने की उसकी आदत पता चलती है।
इन दलीलों के आलोक में अदालत ने ललनी पांडेय बनाम राज्य सरकार के मामले में उच्च न्यायालय के 2010 के निर्णय का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि एक व्यक्ति के खिलाफ एक-दो आपराधिक मामले उसे गुंडा करार देने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
अदालत ने 20 अप्रैल को दिए अपने निर्णय में 1970 की धारा 2(बी) का हवाला दिया जिसमें गुंडा उस व्यक्ति को परिभाषित किया गया है जो आईपीसी के विभिन्न प्रावधानों के तहत दंडनीय अपराधों को आदतन करता है या करने का प्रयास करता है।
अदालत ने कहा कि इस तरह के दंडात्मक कानून के प्रावधानों को लागू करने के लिए व्यक्ति को आदतन अपराधी दिखाया जाना आवश्यक है और यदि ये अपराध एक लंबे अतराल में किए जाते हैं तो आदतन का तत्व स्थापित नहीं हो सकता।
भाषा सं राजेंद्र
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