चुनाव में लगातार हार के बावजूद निर्दलीय उम्मीदवार नहीं हारते हिम्मत
रवि कांत सुरेश
- 04 Apr 2024, 05:41 PM
- Updated: 05:41 PM
(गुंजन शर्मा)
नयी दिल्ली, 04 अप्रैल (भाषा) चुनावी मौसम में जहां उम्मीदवार जीत के लिए जी-तोड़ मेहनत करते हैं, वहीं कुछ उम्मीदवार ऐसे भी हैं जो अपनी हार को ही सम्मान का तमगा मान लेते हैं।
दृढ़ संकल्प वाले कुछ निर्दलीय उम्मीदवारों के एक समूह ने चुनाव हारने का जोखिम उठाया है और यह सुनिश्चित करने के लिए वे सब कुछ कर रहे हैं- लोगों से उन्हें वोट न देने की अपील करने से लेकर असफलता पर इतराने तक।
ऐसे ही एक निर्दलीय उम्मीदवार हैं तमिलनाडु के के. पद्मराजन, जो गर्व से खुद को 'चुनावी राजा' कहते हैं और चुनाव मैदान में शायद वह एकमात्र ऐसे उम्मीदवार हैं, जो लोगों से उन्हें वोट न देने का आग्रह करते हैं, ताकि वह 'सबसे असफल उम्मीदवार' होने का अपना तमगा बरकरार रख सकें। उनकी यह उपलब्धि लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज है।
टायर मरम्मत की दुकान के मालिक के. पद्मराजन (65) को सबसे अधिक चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार के रूप में गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज कराने की उपलब्धि पर भी गर्व है।
उनका दावा है कि धूमधाम के साथ नामांकन पत्र दाखिल करने के खर्च के अलावा चुनावों में जब्त हुई जमानत राशि में अब तक वह 80 लाख रुपये का नुकसान झेल चुके हैं।
चुनाव लड़ने के अपने 239वें प्रयास के लिए तैयारी करते हुए पद्मराजन ने 18वें लोकसभा चुनाव के लिए केरल के त्रिशूर और तमिलनाडु के धर्मपुरी से अपना नामांकन दाखिल किया है।
पद्मराजन ने 'पीटीआई-भाषा' से कहा, ‘‘मैंने 1988 में तमिलनाडु स्थित अपने गृह नगर मेट्टूर से चुनाव लड़ना शुरू किया था। मैंने अब तक 238 चुनाव लड़े हैं, जिनमें पूर्व प्रधानमंत्रियों- अटल बिहारी वाजपेयी, पी वी नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह के खिलाफ उम्मीदवारी भी शामिल है। यह मेरा 239वां प्रयास होगा। मैं हर बार एक अनोखी लड़ाई चुनता हूं।’’
चुनाव प्रचार अभियान के बारे में पूछे जाने पर पद्मराजन ने कहा, ‘‘मैं लोगों से कहता हूं कि वे मुझे वोट न दें, मुझे वोट नहीं चाहिए, क्योंकि मैं सबसे असफल उम्मीदवार का तमगा अपने पास रखना चाहता हूं। मैं प्रचार नहीं करता, लेकिन जब नामांकन दाखिल करता हूं तो भव्य तरीके से।’’
जयललिता, एम करुणानिधि, वाईएसआर रेड्डी और ए के एंटनी जैसे पूर्व मुख्यमंत्रियों से लेकर फिल्मस्टार हेमा मालिनी और विजयकांत तक - ऐसे लोगों की सूची काफी लंबी है, जिनके खिलाफ पद्मराजन ने चुनाव लड़ा है।
वहीं, इंदौर के परमानंद तोलानी अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, जिन्होंने तीन दशकों तक एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा।
परमानंद तोलानी (65) ने 'पीटीआई-भाषा' से कहा, ‘‘मेरे पिता का 1988 में निधन हो गया था और मैं उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहा हूं। मैंने अब तक 18 चुनाव लड़े हैं, जिनमें आठ लोकसभा और आठ विधानसभा चुनाव शामिल हैं। मैं आगामी लोकसभा चुनाव भी लड़ूंगा।’’
प्रॉपर्टी डीलर का काम करने वाले तोलानी ने कहा, ‘‘मेरे पिता की इच्छा थी कि जब तक परिवार से कोई निर्वाचित न हो जाए, हमें यह चलन बंद नहीं करना है। अगर मैं अपने जीवनकाल में ऐसा नहीं कर पाया तो मेरी दोनों बेटियां यह कमान संभालेंगी।’’
पुणे के विजय प्रकाश कोडेकर राज्य बिजली बोर्ड के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं और निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने के पीछे उनका एक अलग एजेंडा है - ‘‘शून्य बजट चुनाव अभियान की वकालत करना।’’
उन्हें लातूर की सड़कों पर स्टील के ठेले को धक्का देते हुए देखा जा सकता है। वह लातूर से ही लोकसभा चुनाव लड़ने की योजना बना रहे हैं। उनके ठेले पर एक फ्लेक्स बोर्ड पर लिखा है ''मैं भी प्रधानमंत्री''।
सफेद धोती पहनकर चुनाव प्रचार करने वाले कोडेकर (78) ने कहा, ‘‘मेरा यह संदेश है कि कोई गरीब व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकता। चुनाव प्रचार पर राजनीतिक दलों द्वारा इतना अधिक खर्च क्यों? बिना धन के भी चुनाव लड़ा जा सकता है और (चुनाव पर खर्च किये जाने वाले) धन का उपयोग जन कल्याण के लिए किया जा सकता है।’’
अब तक 24 चुनाव लड़ चुके कोडेकर अलग-अलग चुनावों के लिए अलग-अलग नाम का इस्तेमाल करते हैं।
कोडेकर ने कहा, ‘‘कुछ चुनाव मैंने विजय नाम से, कुछ 'राष्ट्रपति' नाम से और कुछ 'ज्योशो' नाम से लड़े हैं- क्योंकि मैं ओशो का शिष्य हूं। मैं नाम बदलने की औपचारिकताएं पूरी करता हूं और फिर नये नाम से चुनाव लड़ता हूं।’’
हैदराबाद के तकनीकी विशेषज्ञ रविंदर उप्पुला प्रत्येक लोकसभा चुनाव के लिए अलग-अलग प्रचार रणनीतियों का उपयोग करते हैं। वर्ष 2014 में- यह रणनीति भ्रष्टाचार-विरोधी मार्च था और 2019 में यह केवल एक उपवास था।
रविंदर उप्पुला ने कहा, ‘‘मैं अपने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान वादा करता हूं कि अगर मैं निर्वाचित हुआ तो हर 100 दिन में लाई डिटेक्टर टेस्ट कराऊंगा, ताकि मुझे वोट देने वाली जनता ठगा हुआ महसूस न करे। भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए हमारे राजनेताओं को भी इसी तरह काम करना चाहिए।’’
भाषा रवि कांत