नेकां, माकपा ने शेख अब्दुल्ला की जयंती और 13 जुलाई को अवकाश सूची से बाहर रखने पर निराशा जताई
अमित अविनाश
- 30 Dec 2025, 07:16 PM
- Updated: 07:16 PM
श्रीनगर, 30 दिसंबर (भाषा) जम्मू कश्मीर में सत्तारूढ़ नेशनल कांफ्रेंस (नेकां) ने 1931 के शहीदों की याद में और पार्टी के संस्थापक शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की जयंती को छुट्टियों की सूची में शामिल नहीं करने के उपराज्यपाल के फैसले पर निराशा व्यक्त की है।
नेकां के मुख्य प्रवक्ता तनवीर सादिक ने रविवार देर रात ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘आज की छुट्टियों की सूची और निर्णय कश्मीर के इतिहास और लोकतांत्रिक संघर्ष के प्रति भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उपेक्षा को दर्शाता है।’’
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस महीने की शुरुआत में संकेत दिया था कि अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के बाद हटाई गई छुट्टियां बहाल की जाएंगी।
सादिक ने कहा, ‘‘हमें उम्मीद थी कि शेर-ए-कश्मीर शेख मोहम्मद अब्दुल्ला जैसे नेताओं और 13 जुलाई के शहीदों की याद में छुट्टियां शामिल की जाएंगी, लेकिन ऐसा नहीं होने से उनका महत्व या हमारी विरासत कमतर नहीं होगी। ये छुट्टियां एक दिन फिर से बहाल की जाएंगी।’’
वर्ष 1931 में डोगरा महाराजा के सैनिकों की गोलियों से जान गंवाने वाले 23 व्यक्तियों की याद में 13 जुलाई को जम्मू कश्मीर में सार्वजनिक छुट्टी रहती थी, जबकि पांच दिसंबर को नेकां के संस्थापक शेख अब्दुल्ला की जयंती के उपलक्ष्य में सार्वजनिक अवकाश होता था।
वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने के बाद उपराज्यपाल प्रशासन द्वारा दोनों छुट्टियों को समाप्त कर दिया गया था। उपराज्यपाल प्रशासन द्वारा 2025 के लिए घोषित सार्वजनिक अवकाशों की सूची में ये दिन शामिल नहीं हैं।
इस बीच, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) नेता मोहम्मद यूसुफ तारिगामी ने भी प्रशासन के फैसले को इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने का प्रयास करार दिया।
तारिगामी ने एक बयान में कहा, ‘‘शेख मोहम्मद अब्दुल्ला एक महान व्यक्तित्व थे और स्वतंत्रता संग्राम तथा जम्मू कश्मीर के लोगों के सशक्तिकरण में उनके योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता...।’’
उन्होंने कहा, ‘‘ऐसी महान शख्सियत को कमतर आंकना इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करना है।’’
उन्होंने यह भी कहा कि 13 जुलाई का दिन जम्मू कश्मीर के लिए ऐतिहासिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन लोगों के बलिदान की याद दिलाता है, जिन्होंने निरंकुश शासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए और मानवीय गरिमा की वकालत करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी।
तारिगामी ने लोगों को और अधिक विभाजित करने का प्रयास किये जाने का आरोप लगाते हुए कहा, ‘‘प्रशासन ने इस तरह के फैसले लेकर जम्मू कश्मीर के लोगों का अपमान किया है।’’
भाषा अमित