दवा की प्रभावकारिता ने एचआईवी से निपटने की दिशा में दिखाई उम्मीद की किरण
(360 इन्फो) आशीष मनीषा
- 30 Dec 2025, 04:59 PM
- Updated: 04:59 PM
(वीरेंद्र सिंह चौहान, जीआईटीएएम विश्वविद्यालय, नयी दिल्ली)
नयी दिल्ली, 30 दिसंबर (360 इन्फो) लेनाकापाविर ने बहुऔषधि प्रतिरोधी मामलों के प्रबंधन में उच्च प्रभावकारिता दिखाई है, जो सीमित विकल्प वाले रोगियों के लिए आशा की किरण है।
हाल में अमेरिकी फेडरल ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) द्वारा एक नयी प्रोटोटाइप दवा लेनाकापाविर को मंजूरी दिए जाने के साथ ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस (एचआईवी) के इलाज में एक महत्वपूर्ण सफलता मिली है। इस पद्धति में बहुऔषधि प्रतिरोधी एचआईवी से पीड़ित व्यक्तियों को साल में दो बार इंजेक्शन लगाए जाते हैं।
दवा कंपनी गिलियड साइंसेज द्वारा लेनाकापाविर के विकास को विज्ञान शोध पत्रिका ने 2024 की सफलता बताया है। इसने कहा कि यह ‘‘एचआईवी/एड्स को वैश्विक स्वास्थ्य संकट के रूप में कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।’’
लेनाकापाविर की शुरूआत वैश्विक स्तर पर एचआईवी/एड्स के उपचार में संभावित रूप से एक बड़ा कदम है। यह संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य तीन को प्राप्त करने में मदद कर सकता है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरे के रूप में एचआईवी/एड्स को खत्म करने और 2030 से आगे एक प्रभावी एचआईवी प्रतिक्रिया की ओर बढ़ने का लक्ष्य निर्धारित करता है।
यह सफलता ऐसे समय में मिली है जब 1980 के दशक की शुरुआत में खोजे जाने के बाद से एचआईवी/एड्स वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
शुरुआत में अमेरिका में चिह्नित एचआईवी/एड्स ने तब से दुनिया भर में 4.2 करोड़ से अधिक लोगों की जान ले ली है और 8.8 करोड़ से अधिक लोगों को संक्रमित किया है। 2023 के अंत तक दुनिया भर में 3.99 करोड़ लोग एड्स से पीड़ित थे।
एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी, एचआईवी दवाओं का एक संयोजन जो वायरस से संक्रमित लोगों का इलाज करता है) में प्रगति ने एचआईवी के प्रबंधन को बदल दिया है, लेकिन यह विशेष रूप से वायरस के बहु औषधि-प्रतिरोधी उपभेदों वाले व्यक्तियों के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियां पेश करता है। एचआईवी जूनोटिक ट्रांसमिशन (जानवरों से इंसान में) से उत्पन्न हुआ, जो संभवतः 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में मध्य और पश्चिम अफ्रीका में वानरों से मनुष्यों में आया।
फ्रांसीसी शोधकर्ताओं ने 1983 में उस वायरस की पहचान की जिसे बाद में एड्स (एकवायर्ड इम्यूनोडिफीसिअन्सी सिंड्रोम) के रूप में जाना गया। इससे एक ऐसे वायरस के खिलाफ वैश्विक लड़ाई की शुरुआत हुई जो प्रतिरक्षा प्रणाली को नष्ट कर देता है, जिससे व्यक्ति कई तरह के संक्रमणों और कुछ कैंसरों के प्रति संवेदनशील हो जाता है।
एफडीए द्वारा 1987 में एजेडटी को मंजूरी दिए जाने के बाद पहली बार एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी की शुरुआत की हुई, जो एचआईवी के उपचार में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। अब 50 से अधिक एंटीरेट्रोवायरल दवाएं एफडीए द्वारा अनुमोदित हैं, जो वायरस को प्रभावी ढंग से प्रबंधित करने के लिए कई विकल्प प्रदान करती हैं।
इन प्रगतियों के बावजूद, एचआईवी लाइलाज बना हुआ है, और कई रोगियों को दवा प्रतिरोध जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिसके लिए नए चिकित्सीय नवाचारों की आवश्यकता होती है।
एचआईवी के प्रभाव को समझने के लिए, हाल में आई कोविड-19 महामारी के साथ इसकी तुलना करना मददगार साबित होगा। कोविड-19, जिसे टीकों और उपचार के माध्यम से काफी हद तक रोका जा सकता है, एड्स से अलग है। एड्स अब भी लाइलाज है और इसका प्रबंधन केवल एंटीरेट्रोवायरल उपचारों से ही किया जा सकता है।
कोविड-19 तेजी से फैला, जिससे कुछ ही समय में दुनिया भर में 70 लाख से अधिक मौतें हुईं। कोविड-19 के कारण सार्स-कोव-2 जैसे वायरस का अच्छी तरह से अध्ययन किया गया है, और टीके के विकास के लक्ष्य अच्छी तरह से निर्धारित किए गए हैं।
इसके विपरीत, एचआईवी की उच्च उत्परिवर्तन दर, मानव डीएनए में एकीकरण और लंबी विलंबता अवधि ने टीके के विकास को बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
कोविड-19 के विपरीत, जो मुख्य रूप से तीव्र बीमारी का कारण बनता है, एचआईवी धीरे-धीरे प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करता है, जिससे तपेदिक जैसे संक्रमणों के प्रति दीर्घकालिक जोखिम बढ़ जाता है। इसके परिणामस्वरूप मृत्यु दर बहुत अधिक हो जाती है।
एचआईवी से लड़ने के प्रयास कलंक और भेदभाव के कारण और भी जटिल हो गए हैं, खास तौर पर हाशिए पर पड़े समुदायों के बीच। यह अनुमान लगाया गया है कि उप-सहारा अफ्रीका, जो वैश्विक आबादी का 15 प्रतिशत है, में दो-तिहाई लोग एचआईवी से पीड़ित हैं। 2022 के आंकड़ों के मुताबिक हर हफ्ते लगभग 4,000 लड़कियां और युवतियां एचआईवी से संक्रमित होती हैं।
इस संदर्भ में, बहुऔषधि प्रतिरोधी एचआईवी वाले व्यक्तियों के लिए तैयार की गई दवा लेनाकापाविर को एफडीए की स्वीकृति वास्तव में एक बड़ी सफलता है। लेनाकापाविर की प्रभावकारिता विश्व स्तर पर किए गए व्यापक नैदानिक परीक्षणों के माध्यम से प्रदर्शित की गई, जिसमें दक्षिण अफ्रीका, थाईलैंड, अमेरिका और लातिन अमेरिका के कई देश शामिल हैं।
गिलियड द्वारा किए गए नैदानिक परीक्षण अध्ययन (जिसे पर्पस दो कहा जाता है) के विवरण में कहा गया है, ‘‘परीक्षण में 2,179 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। प्रतिभागियों के बीच एचआईवी संक्रमण को कम करने में लेनाकापाविर अत्यधिक प्रभावी रही। जिस समूह को लेनाकापाविर दवा दी गई, उसमें से दो को छोड़कर 99.9 प्रतिशत प्रतिभागी एचआईवी से मुक्त रहे।’’
परीक्षणों ने वायरल लोड को महत्वपूर्ण रूप से कम करने की इसकी क्षमता पर प्रकाश डाला, विशेष रूप से उन रोगियों में जिनके पास अन्य उपचार विकल्प समाप्त हो गए थे।
लेनाकापाविर ने बहुऔषधि-प्रतिरोधी मामलों के प्रबंधन में उच्च प्रभावकारिता दिखाई है, जो सीमित विकल्पों वाले रोगियों के लिए आशा की किरण है।
लेनाकापाविर को देने की प्रक्रिया में शुरुआत में मुख से दी जाने वाली एक खुराक शामिल है, जिसके बाद हर छह महीने में इंजेक्शन लगाया जाता है। लेनाकापाविर प्रोटीन शेल एचआईवी कैप्सिड को लक्षित करके काम करता है, जो वायरस की आनुवंशिक सामग्री की रक्षा करता है।
यह दवा कोई अलग चिकित्सा नहीं है और इसका प्रयोग अन्य एंटीरेट्रोवाइरल दवाओं के साथ संयोजन में किया जाना चाहिए।
इसकी नवीन प्रणाली और विस्तारित खुराक के कारण इसे एचआईवी देखभाल में एक बड़ी प्रगति के रूप में वर्णित किया गया है और इसे एचआईवी उपचार में शुरुआती टीके-जैसे नवीन विकल्प के रूप में प्रचारित किया जा रहा है।
यह सरलीकृत उपचार अनुपालन में सुधार करता है और छूटी हुई खुराक के कारण उपचार विफलता के जोखिम को कम करता है। हालांकि, विशेष रूप से निम्न और मध्यम आय वाले देशों में लेनाकापाविर के व्यापक उपयोग में एक बड़ी चुनौती, मुख्य रूप से इसकी वर्तमान लागत है।
प्रारंभिक मूल्य निर्धारण में महत्वपूर्ण असमानताएं सामने आई हैं, जिसके कारण सब्सिडी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की मांग की गई है, ताकि दवा को उन लोगों तक पहुंचाया जा सके, जिन्हें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।
‘एड्स से लड़ने के लिए वैश्विक कोष’ (ग्लोबल फंड टू फाइट एड्स) ने वार्षिक रूप से दो बार इंजेक्शन वाली दवा तक सस्ती और समान पहुंच उपलब्ध कराने के समन्वित प्रयास के लिए कई अन्य संस्थाओं के साथ हाथ मिलाया है।
यह ‘‘अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन, संबंधित राष्ट्रीय दवा नियामकों, और विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की सिफारिश से विनियामक अनुमोदन’’ के अधीन है।
हालांकि, अब एफडीए ने इस दवा को मंजूरी दे दी है। लेनाकापाविर को कई देशों में वयस्कों के इलाज के लिए भी मंजूरी दी गई है, जो बहु दवा-प्रतिरोधी एचआईवी से पीड़ित हैं, इसे अन्य एंटीरेट्रोवायरल दवाओं के साथ इस्तेमाल किया जाता है।
ऐसे संकेत हैं कि यह दवा नए एचआईवी संक्रमण को भी रोक सकती है। इस साल अक्टूबर में, गिलियड ने घोषणा की कि उसने ‘‘मुख्य रूप से निम्न और निम्न-मध्यम आय वाले 120 देशों में एचआईवी की रोकथाम के लिए लेनाकापाविर के उच्च-गुणवत्ता वाले, कम-लागत वाले संस्करणों का निर्माण और आपूर्ति करने के लिए छह दवा कंपनियों के साथ रॉयल्टी-मुक्त स्वैच्छिक लाइसेंसिंग पर हस्ताक्षर किए हैं।’’
लेनाकापाविर का विकास एचआईवी के खिलाफ लड़ाई में एक बड़ा अभिनव कदम है, लेकिन यह एचआईवी के खिलाफ अधिक प्रभावकारी उपचारों के लिए निरंतर अनुसंधान के महत्व और आवश्यकता को भी रेखांकित करता है, जिसमें एचआईवी-रोधी टीके नवाचार और समान स्वास्थ्य देखभाल नीतियां शामिल हैं। एचआईवी के खिलाफ लड़ाई जारी है, लेकिन लेनाकापाविर से संक्रमण से निपटने की उम्मीद बढ़ गई है।
(360 इन्फो) आशीष