डाक विरासत प्रेमियों ने पीएमसीएच की ऐतिहासिक इमारत को बचाने की अपील की; जहां आए थे गांधी
देवेंद्र दिलीप नरेश
- 22 Dec 2024, 08:26 PM
- Updated: 08:26 PM
(कुणाल दत्त)
(तस्वीरों के साथ)
पटना, 22 दिसंबर (भाषा) गांधीवादियों और इतिहास प्रेमियों के बाद डाक विरासत में रूचि रखने वाले कई लोग भी पटना स्थित पीएमसीएच की एक सदी से अधिक पुरानी ऐतिहासिक इमारत को संरक्षित करने की मांग कर रहे हैं जहां महात्मा गांधी भारत की आजादी से तीन महीने पहले आये थे।
पटना मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल (पीएमसीएच) की व्यापक पुनर्विकास परियोजना के तहत पुराने पटना जनरल अस्पताल (जिसे पहले बांकीपुर जनरल अस्पताल कहा जाता था) की इमारत को तोड़ा जाना है, जिसमें एक दुर्लभ ब्रिटिशकालीन लिफ्ट भी है, और इस इमारत का अग्रभाग कई ऊंचे भव्य डोरिक स्तंभों से अलंकृत हैं।
पंद्रह मई, 1947 को गांधीजी अपनी पोती मनु की सर्जरी के लिए इस ऐतिहासिक अस्पताल में आए थे, और अभिलेखागार से ली गई एक दुर्लभ श्वेत-श्याम तस्वीर, जिसमें बापू ऑपरेशन थियेटर में एक कुर्सी पर बैठे हुए दिखाई दे रहे हैं, एक नई पुस्तक में प्रकाशित हुई है।
‘पोस्टल हेरिटेज ऑफ बिहार: ए जर्नी ऑफ इंडिया पोस्ट बिहार थ्रू स्टैम्पस’ शीर्षक से इस पुस्तक का विमोचन हाल में पटना में आयोजित बिहार फिलाटेली प्रदर्शनी (बी पेक्स 2024) में किया गया, जिसमें दुनिया के कुछ सबसे पुराने और दुर्लभतम टिकटों को प्रदर्शित किया गया था। इनमें अजीमाबाद (अब पटना) के 1774 में जारी किये तांबे के टिकट की मूल प्रतियां, पेनी ब्लैक, सिंध डॉक और अत्यंत दुर्लभ - ब्रिटिश गुयाना टिकट: वन सेंट मैजेंटा शामिल थे।
बिहार सर्किल के मुख्य पोस्ट मास्टर जनरल अनिल कुमार ने कहा कि यह राज्य में आयोजित अब तक का सबसे बड़ा बी-पेक्स था।
कुमार ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘लगभग 400 फ्रेम 120 विषयों के साथ प्रदर्शित किए गए थे, जिसमें 20,000-25,000 तक डाक टिकट (स्टाम्प) थे। इनमें गांधी डाक टिकटों पर एक विशेष खंड शामिल था, साथ ही 1947 में भारत की स्वतंत्रता के मौके पर जारी किए गए डाकट टिकट भी शामिल थे।’’
‘बापू की स्मृति में’ शीर्षक वाले एक फ्रेम में पीएमसीएच के पुराने अस्पताल के ऑपरेशन थियेटर में बैठे गांधीजी की दूसरी दुर्लभ मोनोक्रोम तस्वीर प्रदर्शित की गई थी। इस तस्वीर के बगल में ही एक पत्र की प्रति भी प्रदर्शित की गई थी जिसे गांधी जी ने उसी दिन, ‘‘15.5.1947’’ को एक पोस्टकार्ड पर पटना से लिखा था।
प्रज्ञ जैन (36) और उनके पिता प्रदीप जैन पटना में पिता-पुत्र फिलेटलिस्ट जोड़ी के रूप में जाने जाते हैं।
‘फिलेटलिस्ट’ का मतलब होता है डाक टिकटों का अध्ययन या संग्रह करने वाला व्यक्ति।
प्रज्ञ ने कहा, ‘‘हमें इस बात का गर्व है कि यह दुर्लभ पोस्टकार्ड हमारे संग्रह का हिस्सा है।’’
उन्होंने कहा कि गांधी ने यह पत्र अंग्रेजी में लिखा था और एक ‘‘मैडम वाडिया’’ को भेजा गया था, जिन्हें गांधी जी ने ‘‘डियर सिस्टर’’ कहकर संबोधित किया था और मूल रूप से इसमें बम्बई (अब मुंबई) के एक स्थान का पता था। लेकिन, वहां से इसे फिर से दक्षिण भारत के नीलगिरि में ऊटकमंड (ऊटी) के ‘गुरु मंदिर’ को भेज दिया गया।
उन्होंने कहा, ‘‘तीन तारीखों वाले पोस्टकार्ड पर किंग जॉर्ज षष्टम की छवि, 9 पाई डाक टिकट, अंततः 22 मई, 1947 को मिला था।’’
प्रज्ञ ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘फिलैटली गांधी की विरासत को कायम रखने का एक तरीका है, लेकिन उनकी असली विरासत उनके द्वारा अपनाए गए मूल्य और पटना तथा बिहार के बाकी हिस्सों में उनसे जुड़ी इमारतें हैं, और इन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए तथा इनका उचित रखरखाव किया जाना चाहिए।’’
उन्होंने पुराने जनरल अस्पताल भवन, जिसका लोकप्रिय नाम ‘हथुआ वार्ड’ है, को संरक्षित करने की वकालत की, ताकि वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियां उस स्थान को ‘‘महसूस कर सकें और छू सकें’’ जहां गांधीजी स्वतंत्रता से कुछ महीने पहले ही आये थे।
पटना के गांधीवादी, लेखक और डाक टिकट संग्रह के शौकीन भैरव लाल दास ने दोहराया कि गांधी से जुड़ी पीएमसीएच की पुरानी इमारत को ‘‘संरक्षित और पुनरुद्धार करके पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाना चाहिए’’।
पीएमसीएच जिसकी स्थापना 1925 में प्रिंस ऑफ वेल्स मेडिकल कॉलेज के रूप में की गई थी, उसकी ऐतिहासिक इमारतों को पुनर्विकास परियोजना के तहत कई चरणों में ध्वस्त किया जाना है। इसमें से कई इमारतें ध्वस्त की जा चुकी हैं और उनके स्थान पर बहुमंजिला इमारतें बनाई जा रही हैं।
पुराना बांकीपुर जनरल अस्पताल मुरादपुर क्षेत्र में कॉलेज की स्थापना के पहले से स्थित है और यह कॉलेज परिसर एक तरफ गंगा और दूसरी तरफ अशोक राजपथ की ओर है।
इस कॉलेज की स्थापना के अगले वर्ष 100 साल पूरे हो जायेंगे और फरवरी में भव्य समारोह आयोजित करने की योजना है।
वर्ष 2000 में पीएमसीएच के 75 वर्ष पूरे होने पर एक विशेष डाक टिकट जारी किया गया था जिस पर पुराने बांकीपुर जनरल अस्पताल की छवि को अंकित किया गया था। लेकिन विडंबना यह है कि जब कॉलेज अपनी स्थापना के 100 पूरे करने की दहलीज पर खड़ा है उस वक्त इसकी इस ऐतिहासिक इमारत को ध्वस्त किये जाने का खतरा मंडरा रहा है।
भाषा देवेंद्र दिलीप