सिब्बल ने भारतीय लोकतंत्र की स्थिति पर जताई चिंता, प्रधानमंत्री मोदी पर साधा निशाना
ब्रजेन्द्र ब्रजेन्द्र दिलीप
- 16 Dec 2024, 09:43 PM
- Updated: 09:43 PM
नयी दिल्ली, 16 दिसंबर (भाषा) पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य की आलोचना के साथ ही वैश्विक तकनीकी शक्तियों से संभावित खतरों के बारे में चेतावनी देते हुए सोमवार को ‘भारतीय लोकतंत्र की स्थिति’ पर गंभीर चिंता जताई।
‘भारत के संविधान के 75 वर्षों की गौरवशाली यात्रा’ पर राज्यसभा में जारी चर्चा में भाग लेते हुए निर्दलीय सदस्य सिब्बल ने देश के लोकतांत्रिक ढांचे में प्रणालीगत विफलताओं को भी रेखांकित किया।
उन्होंने परोक्ष रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा, ‘‘भारत केवल एक व्यक्ति के बारे में नहीं है, भारत इस देश के लोगों के बारे में है।’’
अनुभवी राजनेता ने देश के लोकतांत्रिक संस्थानों के सामने आने वाली कई चुनौतियों को रेखांकित किया।
उन्होंने आर्थिक असमानताओं की ओर इशारा करते हुए कहा कि एक प्रतिशत आबादी के पास देश की 40-50 प्रतिशत संपत्ति है। सिब्बल ने दलितों के खिलाफ हिंसा की घटनाओं और चल रही नागरिक अशांति का हवाला देते हुए सामाजिक न्याय के बारे में भी चिंता जताई।
एक महत्वपूर्ण चेतावनी में, सिब्बल ने कृत्रिम मेधा (एआई) के संभावित खतरों की ओर ध्यान आकर्षित किया।
उन्होंने जोर देकर कहा कि वैश्विक शक्तियां आबादी को नियंत्रित करने और हेरफेर करने के लिए एआई एल्गोरिदम का फायदा उठा सकती हैं। उन्होंने इसे ‘एक शानदार अवसर, लेकिन भविष्य के लिए एक बड़ा खतरा’ बताया।
सिब्बल ने अपने संबोधन में संस्थागत अखंडता पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने संसद, राज्यपालों की कार्यप्रणाली और निर्वाचन आयोग जैसी संस्थाओं के महत्व पर जोर दिया।
उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘जब संस्थाएं ही नहीं बचेंगी, तो आप कैसे बचेंगे... हम नहीं बचेंगे, हमारा लोकतंत्र नहीं बचेगा।’’
उच्च सदन के वरिष्ठतम सदस्यों में शुमार सिब्बल ने वर्तमान राजनीतिक ढांचे की विशेष रूप से आलोचना की और इसे ‘प्रदूषित’ बताया और विशिष्ट व्यक्तियों या पार्टियों को दोष देने के बजाय सामूहिक विफलता के लिए ‘इस स्थिति’ को जिम्मेदार ठहराया।
सिब्बल ने कहा, ‘‘संविधान निर्माताओं की कुछ आकांक्षाएं थीं कि सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक न्याय होगा। जिस देश की संपत्ति एक फीसदी लोगों के पास है, तब कौन से आर्थिक न्याय की बात हो रही है। जहां दलितों की पीट-पीटकर हत्या होती है, वहां कौन सा सामाजिक न्याय हो रहा है। व्यवस्था जातियों के माध्यम से चलाई जा रही है। जिसकी सरकार होती है वही नियुक्त होते हैं। पैसा चुनाव पर राज कर रहा है। इनके बारे में बात नहीं की जा रही है।’’
उन्होंने कहा, ‘‘सारी संस्थाओं पर कब्जा कर लिया गया है। चुनाव आयोग क्या कर रहा है? एक वक्त था, जब चुनाव होता था तो चुनाव आयोग मीडिया को संबोधित करता था और सब जानकारी देता था। मगर अब वह बताने के लिए ही तैयार नहीं है कुछ।’’
चर्चा में भाग लेते हुए असम गण परिषद के बीरेंद्र प्रसाद बैश्य ने कांग्रेस पर हमला किया और आरोप लगाया कि उसने असम को भारतीय संविधान की प्रस्तावना के प्रमुख सिद्धांतों से वंचित रखा और यहां तक कि 1983 में ‘अवैध चुनाव’ कराए।
उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने बांग्लादेशियों के असम में प्रवेश को रोकने के लिए संविधान में संशोधन किया था, लेकिन तब उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप से इसे रोक दिया गया था।
बीजू जनता दल (बीजद) के सुभाशीष खुंटिया ने सरकार से आगामी आम जनगणना में जाति आधारित जनगणना को शामिल करने का आग्रह किया।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बृज लाल ने कई घटनाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे कांग्रेस ने भारतीय संविधान के निर्माता और देश के पहले कानून मंत्री बाबा साहेब आंबेडकर का ‘अपमान’ करने का कोई मौका नहीं छोड़ा और यहां तक कि उन्हें अवसरों से भी वंचित रखा।
उन्होंने मंत्री रहते हुए आंबेडकर के कथित इस्तीफे के पत्र की प्रति गायब होने की जांच की भी मांग की। बृज लाल के मुताबिक, इसमें आंबेडकर ने सवाल किया था कि सिर्फ मुसलमानों को ही सुरक्षा की जरूरत क्यों है, दलितों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को क्यों नहीं।
उस वक्त सदन में मौजूद कांग्रेस के जयराम रमेश ने भाजपा सदस्य को टोकते हुए कहा कि आंबेडकर के इस्तीफे का पत्र रिकार्ड में है और सत्तारूढ़ दल के सदस्य असत्य बोल रहे हैं।
एमडीएमके के वाइको और तृणमूल कांग्रेस के प्रकाश चिक बराइक ने भी चर्चा में भाग लिया।
भाषा ब्रजेन्द्र ब्रजेन्द्र