वकीलों, कार्यकर्ताओं ने ‘पोश’ अधिनियम के दायरे में राजनीतिक दलों को लाने की मांग की
धीरज सुभाष
- 15 Dec 2024, 05:18 PM
- Updated: 05:18 PM
(उज्मी अतहर)
नयी दिल्ली, 15 दिसंबर (भाषा) कानूनी विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं ने लैंगिक समानता एवं जवाबदेही की आवश्यकता का हवाला देते हुए राजनीतिक दलों को कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम के दायरे में तत्काल लाने की मांग की है।
इस अधिनियम को ‘पोश’ अधिनियम के रूप में भी जाना जाता है।
सोमवार को उच्चतम न्यायालय द्वारा एक याचिका का निस्तारण किये जाने के बाद यह मांग की गई है। याचिका में, राजनीतिक दलों को 2013 के पोश अधिनियम के तहत कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा के लिए प्रक्रिया का पालन करने संबंधी निर्देश देने का अनुरोध किया गया था।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि वह पोश अधिनियम लागू कराने के लिए एक अभिवेदन के साथ निर्वाचन आयोग का रुख करें।
वकील और गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) हेल्पिंग हैंड्स की निदेशक सोनल मट्टू ने नजरिए में बदलाव लाने की अपील की तथा राजनीतिक दलों से कानून की तकनीकी परिभाषा के बजाय उसकी भावना पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह किया।
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में कहा, ‘‘समस्या यह है कि वे कानून की भावना के विपरीत कानून की तकनीकी पहलुओं पर जोर दे रहे हैं। यदि आप कानून को अक्षरश: देखेंगे, तो हां, आपको यह समझने में मुश्किल होगी कि नियोक्ता कौन है... लेकिन यदि आप कानून की भावना को देखेंगे, तो इसे लागू करना बहुत आसान है, क्योंकि हर राजनीतिक दल में एक अनुशासन समिति होती है।’’
उन्होंने कहा कि इसी प्रकार, यह ऐसे लोगों का समूह है, जिन्हें यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है कि शिष्टता का पालन किया जाए तथा कोई भी सदस्य ऐसा कुछ न करे, जिससे पार्टी की बदनामी हो।
मट्टू ने कहा, ‘‘इसी तरह, वे एक समिति गठित कर सकते हैं जो पार्टी कार्यकर्ताओं और पार्टी के भीतर लोगों के अनुचित आचरण से संबंधित व्यवहार पर भी नजर रखे। इसलिए, यदि आप कानून की तकनीकी पहलुओं पर गौर करेंगे और देखेंगे कि नियोक्ता कौन है, तो आपको यह आसानी से नहीं पता चलेगा।’’
उन्होंने कहा, ‘‘लेकिन यदि आप राजनीतिक दलों के अंदर अन्य संस्थाओं को देखें, जो अनुशासन और अन्य आचरण या कदाचार पर नजर रखती हैं, तो उनके साथ काम करने वाली महिला सहकर्मियों से उपयुक्त आचरण सुनिश्चित करने के मामले में इसी तरह की व्यवस्था को बनाना बहुत आसान है। मुझे लगता है कि पूरा विचार कानून की तकनीकी पहलुओं के बजाय उसकी भावना को देखने के संबंध में है।’’
प्रमुख वकील शिल्पी जैन ने हालांकि नेताओं के पास मौजूद अपार शक्तियों को ध्यान में रखते हुए आंतरिक समितियों की स्वतंत्रता को लेकर आशंका जताई।
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में कहा, ‘‘किसी राजनीतिक समूह द्वारा वित्तपोषित आंतरिक समिति के पास कम शक्ति होगी। ऐसी संस्थाओं के प्रभावी ढंग से काम करने के लिए स्वतंत्रता और साहस आवश्यक है। दुर्भाग्य से, कई नेताओं के सत्ता का दुरुपयोग करने को देखते हुए, इसे हासिल करना एक चुनौती बनी हुई है।’’
जैन ने कहा कि नेताओं से जुड़े यौन उत्पीड़न के मामलों को निपटाने के लिए अदालतें बेहतर स्थिति में हैं, क्योंकि आंतरिक तंत्र में अंतर्निहित पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ सकता है।
कार्यकर्ताओं की दलील हैं कि राजनीतिक दलों के भीतर उत्पीड़न का निवारण करने से समाज में लैंगिक समानता में सुधार के लिए एक मिसाल कायम होगी।
एनजीओ ‘अनहद’ की संस्थापक शबनम हाशमी ने इसे ‘प्रगतिशील’ कदम बताया।
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘नेताओं से अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करने की अपेक्षा की जाती है। यदि वे लैंगिक समानता की अनदेखी करते रहेंगे तो इससे समाज में गलत संदेश जाएगा। वहीं, राजनीतिक दलों में इस तरह की व्यवस्था करने से धीरे-धीरे लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव आएंगे, जैसा कि हमने पंचायतों में 33 प्रतिशत आरक्षण लागू होने के बाद महिलाओं के मुखर होने के रूप में देखा है।’’
दुष्कर्म रोधी कार्यकर्ता और पीपुल अगेंस्ट रेप इन इंडिया (पीएआरआई) की संस्थापक योगिता भयाना ने इस ‘विडंबना’ की आलोचना की कि संसद ने अपने द्वारा बनाए गए कानून के दायरे से खुद को बाहर रखा है।
उन्होंने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में सवाल किया, ‘‘यदि 10 से अधिक सदस्यों वाली संस्था को पोश अधिनियम लागू करना आवश्यक है, तो राजनीतिक दलों को इससे बाहर क्यों रखा गया है? संसद ने खुद ही यह कानून बनाया है। आंतरिक रूप से इसे लागू करने में उनकी असमर्थता उनमें उत्पीड़न का सामना करने की अनिच्छा को दर्शाती है।’’
भयाना ने विभिन्न क्षेत्रों में पोश अधिनियम का सही से कार्यान्वयन नहीं किये जाने के बड़े मुद्दे का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा, ‘‘हमें एक ऐसे ढांचे की आवश्यकता है जो न केवल व्यापक हो, बल्कि प्रभावी ढंग से लागू भी हो।’’
पोश अधिनियम के तहत ‘‘कार्यस्थल’’ की कानूनी परिभाषा राजनीतिक दलों पर इसे लागू किये जाने को जटिल बनाती है।
वर्ष 2022 के केरल उच्च न्यायालय के एक फैसले में कहा गया है कि राजनीतिक दलों के बीच नियोक्ता-कर्मचारी जैसे संबंध नहीं होते हैं और उन्हें आंतरिक शिकायत समितियां स्थापित करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
भाषा धीरज