कारण बताए बिना सामान्य आदेश से चुनाव अवधि में लाइसेंसी शस्त्र जमा कराने पर रोक
सं आनन्द रंजन
- 01 Apr 2024, 09:48 PM
- Updated: 09:48 PM
लखनऊ, एक अप्रैल (भाषा) इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने कहा है कि किसी भी लाइसेंस धारक को चुनाव अवधि के दौरान बिना कारण बताए वैध लाइसेंसी हथियारों को जमा करने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन की एकल पीठ ने राज्य के अधिकारियों को चेताते हुये रविशंकर तिवारी एवं अन्य द्वारा दायर एक रिट याचिका पर यह आदेश पारित किया।
पीठ ने नाराजगी जाहिर की कि चुनाव के दौरान राज्य सरकार सामान्य आदेश पारित कर लाइसेंस धारकों को शस्त्र जमा करने का आदेश जारी कर देती है, जबकि अदालत बीस साल से अधिक समय से आदेश करती आ रही है कि शस्त्र जमा करने के लिए सामान्य आदेश जारी नहीं किया जा सकता है।
पीठ ने कहा कि संबंधित अधिकारी को उक्त आदेश में विशेष रूप से यह बताना होगा कि शस्त्र जमा कराने का क्या कारण है।
पीठ ने कहा कि अदालत दो दशकों से आदेश पारित कर रही है लेकिन राज्य के अधिकारी इसका अनुपालन नहीं कर रहे हैं।
पीठ ने कहा कि बिना विशेष कारण इंगित किये आदेश पारित कर दिये जा रहे हैं जिससे एक बार फिर से उच्च न्यायालय में शस्त्रों को जमा कराने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं की बाढ़ आ गयी है।
अदालत ने कहा कि यदि आगे से इस प्रकार की कोई याचिका उच्च न्यायालय में दाखिल हुई तो संबंधित अधिकारी पर भारी हर्जाना ठोका जाएगा।
हालांकि, पीठ ने यह कहते हुए स्पष्ट किया, "यदि राज्य प्राधिकरण के पास लाइसेंस धारक को अपनी बंदूक जमा करने के लिए वैध कारण हैं, तो सक्षम प्राधिकारी इस संबंध में एक विशिष्ट आदेश पारित कर सकता है।"
याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि उन्हें बिना कारण बताए हथियार जमा करने के लिए कहा गया था, जो उच्च न्यायालय द्वारा पारित कई आदेशों का स्पष्ट उल्लंघन है, जिन आदेशों में राज्य को लाइसेंस प्राप्त हथियार जमा करने के लिए चुनाव अवधि के दौरान कोई भी सामान्य आदेश जारी करने से रोक दिया गया था।
पीठ ने कहा कि उच्च न्यायालय ने राज्य के मुख्य सचिव और प्रमुख सचिव (गृह) को इस संबंध में अदालत के निर्देशों का पालन करने के लिए संबंधित अधिकारियों को निर्देश जारी करने के लिए विशिष्ट निर्देश दिए थे, लेकिन आज तक कोई ध्यान नहीं दिया गया है।
राज्य प्राधिकारियों के ढुलमुल रवैये से नाराज पीठ ने कहा, “यह इंगित करता है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत राज्य की सर्वोच्च अदालत द्वारा जो निर्णय पारित किए गए हैं और राज्य के सभी प्राधिकारियों पर बाध्यकारी हैं, उन्हें लागू नहीं किया जा रहा है।”
पीठ ने साफ कहा कि आसानी से नजरअंदाज कर दिया जाता है और उसका पालन नहीं किया जाता है, जिन मामलों को स्थानीय अधिकारियों के स्तर पर सुलझाया जा सकता है, वे बार-बार इस न्यायालय का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं जो संबंधित अधिकारियों के उदासीन दृष्टिकोण को दर्शाता है।
भाषा सं आनन्द