कांग्रेस के प्रधानमंत्री ‘कच्चातिवु’ पर उदासीन रहे, भारतीय मछुआरों के अधिकार छीने : जयशंकर
अमित माधव
- 01 Apr 2024, 08:38 PM
- Updated: 08:38 PM
(तस्वीरों के साथ)
नयी दिल्ली, एक अप्रैल (भाषा) विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने सोमवार को दावा किया कि कांग्रेस के प्रधानमंत्रियों ने कच्चातिवु द्वीप को लेकर उदासीनता दिखायी जैसे उन्हें कोई परवाह नहीं हो और भारतीय मछुआरों के अधिकारों को छोड़ दिया जबकि कानूनी राय इसके खिलाफ थी।
जयशंकर ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा कि जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी जैसे प्रधानमंत्रियों ने कच्चातिवु को एक ‘‘छोटा द्वीप’’ और ‘‘छोटी चट्टान’’ बताया था। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा अचानक सामने नहीं आया है बल्कि यह हमेशा से एक जीवंत मुद्दा रहा है।
कच्चातिवु द्वीप एक समुद्री सीमा समझौते के तहत 1974 में श्रीलंका को दे दिया गया था।
जयशंकर ने कहा कि इसके रिकॉर्ड मौजूद हैं कि तत्कालीन विदेश सचिव ने तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एवं द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) के नेता एम करुणानिधि को दोनों देशों के बीच हुई बातचीत की पूरी जानकारी दी थी। उन्होंने क्षेत्रीय दल द्रमुक पर कांग्रेस के साथ 1974 में और उसके बाद एक ऐसी स्थिति उत्पन्न करने के लिए मिलीभगत करने का आरोप लगाया जो "बड़ी चिंता" का कारण है।
उन्होंने कहा, "वही लोग जो इस सब में शामिल थे, आज खड़े होकर स्वयं को मछुआरों के हिमायती होने का दिखावा करने की कोशिश कर रहे हैं।"
भारत और श्रीलंका के बीच पहले 1974 में और फिर 1976 में हुए समझौतों का हवाला देते हुए जयशंकर ने कहा कि केंद्र सरकार और उस समय के प्रधानमंत्रियों द्वारा भारत के क्षेत्र के बारे में दिखायी गई उदासीनता एक आवर्ती विषय है। उन्होंने नेहरू और गांधी का नाम उनकी टिप्पणियों के लिए लिया। जयशंकर ने कहा, "सच तो यह है कि उन्हें इसकी परवाह ही नहीं थी।"
उन्होंने कहा कि 20 वर्षों में, 6,184 भारतीय मछुआरों को श्रीलंका ने हिरासत में लिया है और मछली पकड़ने वाली उनकी 1,175 नौकाओं को पड़ोसी देश ने जब्त कर लिया है।
जयशंकर ने कहा कि यह नरेन्द्र मोदी सरकार है जो इसे सुनिश्चित करने के लिए काम कर रही है कि भारतीय मछुआरों की रिहायी हो। उन्होंने कहा, "हमें एक समाधान ढूंढना होगा। हमें श्रीलंका सरकार के साथ बैठना होगा और इस पर काम करना होगा।"
जयशंकर ने कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश के इस दावे को भी खारिज कर दिया कि 1974 में श्रीलंका से 6,00,000 तमिलों की भारत वापसी दोनों देशों के बीच द्वीप समझौते के कारण संभव हुई थी। उन्होंने कहा कि समझौते में ऐसा कुछ भी नहीं है जो पहले से मौजूद लाभ के अलावा कोई लाभ देता हो।
सरकार के राष्ट्रवादी विचारों को स्पष्ट तरीके से रखने के कारण जयशंकर के समर्थकों की संख्या में वृद्धि हुई है, खासकर भाजपा समर्थकों के बीच। उन्होंने लोकसभा चुनाव प्रचार के बीच, पार्टी द्वारा कच्चातिवु मुद्दे को उठाये जाने का इससे कोई संबंध होने को कोई तवज्जो नहीं दी।
उन्होंने कहा कि इसे इसलिए उठाया जा रहा है क्योंकि यह एक जनता से जुड़ा मुद्दा रहा है और जिन लोगों को वर्षों तक "गुमराह" किया गया है, उन्हें इसके बारे में जानने का अधिकार है।
यह पूछे जाने पर कि क्या सरकार द्वीप पर पुनः दावा करने की योजना बना रही है, जयशंकर ने यह कहते हुए सवाल टाल दिया कि द्वीप से संबंधित मुद्दा उच्चतम न्यायालय में है। उन्होंने कहा कि यह मामला अदालत में विचाराधीन है और किसी को भी कोई अटकल नहीं लगानी चाहिए।
उन्होंने कहा, ''वे इस मुद्दे को ऐसे देखते हैं जैसे कि इसके लिए उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं है।'' जयशंकर ने कहा कि उन्होंने जो किया है, उसे स्वीकार करना चाहिए। जयशंकर ने कहा, "सच्चाई यह है कि आज हम जानते हैं कि यह किसने किया और किसने इसे छुपाया।"
जयशंकर ने कहा कि आए दिन यह मुद्दा संसद में उठाया जाता है और इसे लेकर अक्सर केंद्र तथा राज्य सरकार के बीच पत्राचार होता है। जयशंकर ने कहा कि खुद उन्होंने कम से कम 21 बार मुख्यमंत्री को जवाब दिया है।
मंत्री ने कहा कि तत्कालीन अटॉर्नी जनरल एम सी सीतलवाड सहित कानूनी राय में द्वीप के जलक्षेत्र में भारतीय मछुआरों के अधिकारों का समर्थन किया गया था, लेकिन तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 1974 में संसद को आश्वासन दिया कि उन्हें पारंपरिक रूप से जो अधिकार प्राप्त हैं, वे जारी रहेंगे तथा उसके बाद 1976 में इसे छोड़ दिया।
प्रधानमंत्री मोदी ने भी कच्चातिवु द्वीप मुद्दे पर कांग्रेस और द्रमुक पर निशाना साधा है।
भाषा अमित