न्यायमूर्ति खन्ना ने चयन समिति से सीजेआई को बाहर रखने संबंधी याचिकाओं की सुनवाई से खुद को अलग किया
अमित संतोष
- 03 Dec 2024, 09:07 PM
- Updated: 09:07 PM
नयी दिल्ली, तीन दिसंबर (भाषा) प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) और निर्वाचन आयुक्तों (ईसी) की चयन समिति से सीजेआई को बाहर रखने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई से मंगलवार को स्वयं को अलग कर लिया।
मामले की सुनवाई की शुरुआत में न्यायमूर्ति संजय कुमार के साथ पीठ में शामिल रहे प्रधान न्यायाधीश ने छह अलग-अलग याचिकाओं के याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकीलों से कहा कि वह अभी याचिकाओं पर सुनवाई नहीं कर सकते।
प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘‘इस मामले को उस पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करें जिसका मैं हिस्सा नहीं हूं।’’
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन और वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि न्यायमूर्ति खन्ना की अगुवाई वाली पिछली पीठ ने मामले में नोटिस जारी किया था और अंतरिम आदेश पारित किए थे तथा यदि वे मामले की सुनवायी जारी रखते हैं तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है।
न्यायमूर्ति खन्ना ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ के सेवानिवृत्त होने के बाद 51वें प्रधान न्यायाधीश के रूप में शपथ ली है। न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा कि ये मामले अब छह जनवरी, 2025 से शुरू होने वाले सप्ताह में किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किए जाएंगे।
इसके साथ ही, पीठ ने केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग को उठाई गई चुनौतियों पर अपने जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।
याचिकाओं पर नोटिस जारी करने वाली पीठ इस दलील से सहमत नहीं थी कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति पर इस नये कानून पर रोक लगाई जाए।
वर्ष 2023 के कानून के तहत निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करते हुए पीठ ने कहा था, ‘‘विचाराधीन कानून को निलंबित करना अपवाद है, नियम नहीं।’’
पीठ ने कहा कि चयन प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने से ‘‘अव्यवस्था और एक तरह से संवैधानिक संकट’’ उत्पन्न होगा।
याचिकाओं में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 7 की वैधता को चुनौती दी गई है और उसके संचालन पर रोक लगाने का अनुरोध किया गया है, जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों को चुनने वाली समिति से सीजेआई को बाहर रखती है।
याचिकाओं में अधिनियम की धारा 7 और 8 की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया है, जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) और निर्वाचन आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति की प्रक्रिया को रेखांकित करती है।
वर्ष 2023 अधिनियम ने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव किए, जो निर्वाचन आयोग (निर्वाचन आयुक्तों की सेवा की शर्तें तथा कार्य-संचालन) अधिनियम, 1991 के पहले के प्रावधानों की जगह लेता है।
नये कानून का सबसे विवादास्पद पहलू चयन समिति से सीजेआई को बाहर रखना है। इसके बजाय, अब तीन सदस्यीय समिति की सिफारिशों के आधार पर नियुक्तियां की जाती हैं, जिसमें प्रधानमंत्री, एक कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता या लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता शामिल होते हैं।
अधिनियम की धारा 8 चयन समिति को अपनी प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से विनियमित करने का अधिकार देती है और केंद्रीय कानून मंत्री के नेतृत्व वाली खोज समिति द्वारा अनुशंसित उम्मीदवारों से परे उम्मीदवारों पर विचार करने की अनुमति देती है।
कांग्रेस नेता जया ठाकुर, द एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, द पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज और लोक प्रहरी सहित कई याचिकाकर्ताओं ने इस कानून को चुनौती दी है।
उन्होंने कहा कि अधिनियम निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को कमजोर करता है, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है।
याचिकाओं में यह भी बताया गया है कि न्यायिक मिसाल के माध्यम से स्थापित पिछली व्यवस्था में संस्था की स्वायत्तता की रक्षा के लिए चयन प्रक्रिया में सीजेआई की भागीदारी अनिवार्य थी।
नया कानून उच्चतम न्यायालय के उस फैसले के बाद लागू किया गया था जिसमें निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को कार्यपालिका से अलग रखने की आवश्यकता पर जोर दिया गया था।
फैसले में चयन समिति में भारत के प्रधान न्यायाधीश को शामिल करने का उल्लेख था। हालांकि, 2023 का अधिनियम इस सिफारिश से अलग है, जिससे संभावित राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर चिंताएं उत्पन्न हुईं।
भाषा अमित